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जातिबंधुओं ने पिछले पांच हजार वर्षों में गैर ब्राह्मणों और अस्पृश्यों को कई तरीकों से सुनियोजित ढंग से यातनाएं दीं हैं। उनके ही जातिबंधुओं ने पुराण आदि धर्मशास्त्रों में लिखा कि आपको धार्मिक अधिकार नहीं हैं और आप लोग ब्राह्मणों से नीच हैं और फिर शासकों से उस पर अमल कराया। अब वे कहते हैं कि ”देशाभिमान केवल ब्राह्मणों में पाया जाने वाला सद्गुण है इसलिए ब्राह्मण देश के लिए जेल यात्रा, यातनाएं और फांसी आदि सजाएं भोगते रहे हैं।“ यदि गैर-ब्राह्मण और अस्पृश्य सजा पाने के लिए आगे आने लगे तो यही ब्राह्मण कहने लगेंगे कि तुम्हें राजनीति समझ में नहीं आती। सरकारी नौकरियों के सारे महत्वपूर्ण पद ब्राह्मणों के पास हैं। यदि गैर-ब्राह्मण और अस्पृश्य उन्हें हासिल करने की कोशिश करने लगे तो ब्राह्मण कहेंगे कि तुम इन पदों के योग्य (एफिशिएंट) नहीं हो। कहने का तात्पर्य यह है कि अब तक ब्राह्मण यही सोचकर व्यवहार करते रहे कि राजनीति, धर्म आदि में हम ही श्रेष्ठ हैं और सब कनिष्ठ हैं। इस कारण उनमें मानसिक उद्दण्डता, मुंहजोरी और बौद्धिक व्याभिचारिता आ गई है। गैर-ब्राह्मण समाज और अस्पृश्य समाज ब्राह्मणों की इस मानसिक उद्दण्डता और बौद्धिक व्याभिचारिता से डरकर भयभीत होकर उनके गुलाम के रूप में अब तक चुपचाप जीते रहे। लेकिन इन दोनों समाजों को अपनी गलती समझ में आ गई है। और यदि ये दोनों समाज एकजुट होकर यदि आत्मविकास का आंदोलन शुरू करेंगे तो इन सफेदपोश समाज की गुलामी से जल्दी ही मुक्त हो जाएंगे। लेकिन ऐसा होना बहुत कठिन है क्योंकि मराठा आदि लोग सत्यशोधक विचारों की कितनी भी शेखी क्यों न बघारें लेकिन वे अभी तक मन और बुद्धि से ब्राह्मणी विचारधारा के गुलाम हैं। हमारा अस्पृश्य समाज मराठा आदि लोगों की तरफ देख रहा है। मेरा इस समाज से यही कहना रहा है आप किसी की गुलामी मत मानो। मैं मन और बुद्धि से ब्राह्मणों की गुलामी से मुक्त हो चुका हूं। मैं इस जाति के नामकरण संस्कार का भोजन हजम कर चुका हूं। मैं इस जाति की रग-रग से परिचित हूं। यह जाति सर्वत्र अपना वर्चस्व कायम करने के लिए लोगों को भ्रमित करती रहती है। उनकी बौद्धिक चालाकियों का भंडा फोड़ कर अस्पृश्यों को इन लोगों से दूर रखना, मैं अपना कर्त्तव्य समझता हूं। क्योंकि मैं अपनी अंधी जनता के हाथों की लाठी हूं। यदि मेरी जनता इस लाठी के सहारे प्रगति की राह पर चलने लगी तो सोमण जैसे भोंदू और भ्रमित करने वाले लोगों द्वरा तैयार किए गए गड्ढों में नहीं गिरेगी। *
* संदर्भ : डॉ. बी.आर. अम्बेडकर, चरित्र : लेखक चांगदेव भवानराव खैरमोड़े, खण्ड 2, पृष्ठ सं. 149, 150, 151