7. जागृति की ज्योत को कभी भी बुझने न दें - मार्च 1927 कोलाबा - Page 49

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कोलाबा जिला बहिष्कृत परिषद का सम्मेलन महाड के सि. प्रा. ना. मंडल के नाटकगृह में मार्च 1927 की 19 शनिवार और 20 रविवार को आयोजित किया गया था। सम्मेलन में 3000 से ज्यादा अस्पृश्य लोग एकत्रित हुए थे। अनेक प्रतिष्ठित व्यक्ति परिषद् में उपस्थित थे। उनमें मेसर्स ग. नि. सहस्रबुद्धे, अनंत विनायक चित्रे, सीतारम नामदेव शिवतरकर, बालाराम अम्बेडकर, पांडुरंग नथुराम राजभोज, शांताराम अनाजी उपशाम, मोरे. रामचंद्र शिंदे, धोंडीराम नारायण गायकवाड़, शिवराम गोपाल जाधव आदि बहिष्कृत वर्ग के लोग मौजूद थे। 19 तारीख को पांच बजे के बाद सम्मेलन शुरू हुआ। प्रारंभ में सम्मेलन के स्वागताध्यक्ष संभाजी तुकाराम गायकवाड़ ने परिषद् में पधारे लोगों का स्वागत करके सम्मेलन के आयोजन का उद्देश््य संक्षेप में बताया। इसके पश्चात् नियमानुसार प्रस्ताव और अनुमोदन होने के बाद सम्मेलन के नियोजित अध्यक्ष डॉ. भीमराव रामजी अम्बेडकर, एम.ए., पी.एच-डी. डी.एस.सी, बार-एट-लॉ ने अपना स्थान ग्रहण किया। उन्होंने अपने भाषण में कहा-

सद्गृहस्थ जनो,

आज आपने मेरा सम्मान किया इसके लिए मैं आपका अत्यंत आभारी हूं। जब इस परिषद की अध्यक्षता करने का मुझसे अनुरोध किया गया तो उस समय मैं अपने स्वभाव के अनुसार टालने की सोच रहा था। लेकिन जब लगा कि इसे टाला नहीं जा सकता और टालने पर लोगों में क्षोभ पैदा होगा यह जानकर मैंने कोई ना-नुकुर किए बगैर स्वसंतोष से यह जिम्मेदारी स्वीकार की और उसके अनुसार मैं आपके सामने खड़ा हूं।

सज्जनों, एक तरह से यहां आकर मुझे खुशी ही हो रही है। जिसे-तिसे अपने मूलस्थान के बारे में अभिमान न भी हो मगर प्रेम तो होता ही है। मेरे पिताजी रिटायर होने के बाद स्थायी निवास के उद्देश्य से दापोली आकर रहे। मैंने अपनी पढ़ाई का पहला पाठ दापोली में ही पढ़ा। लेकिन परिस्थतियों के कारण मैं जब पांच-छह बरस का था तब घाटी की तलहटी छोड़नी पड़ी। उसके बाद घाटी के शिखर पर ही मेरा आज तक का जीवन व्यतीत हुआ। आज पच्चीस वर्ष बाद मैं घाटी के नीचे उतर रहा हूं। जिस क्षेत्र को प्रकृति ने अपने सौन्दर्य से सजाया है उस क्षेत्र में आकर किस को खुशी नहीं होगी। जिसे इस प्रदेश से अपनी मातृभूमि होने के कारण प्रेम है उसका आनंद दोगुना हो जाए तो अचरज नहीं होना चाहिए। लेकिन मैं यह कहे बिना नहीं रह सकता कि आज के अवसर पर मुझे जितनी खुशी हो रही है, उतना

खेद भी है। एक समय यह प्रदेश अस्पृश्य जाति की दृष्टि से बहुत आगे था। एक