89. ‘मुक्ति कोन पथे?’ - मई 1936 दादर (मुंबई) - Page 482

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13 अक्तूबर, 1935 को येवले में डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने ऐतिहासिक घोषणा की कि, ”मैं अस्पृश्य हिंदू का दाग लेकर पैदा हुआ, लेकिन यह बात मेरे बस में नहीं थी। किंतु, हिंदू कहलाते हुए मैं मरूंगा नहीं, यह बात मेरे बस में है।“ उनकी इस घोषणा से हिंदू तथा अन्य धर्म के लोग हकबकाते हुए जाग गए। उनकी कही बात पर अनुकूल तथा प्रतिकूल प्रतिक्रियाएं आने लगी थीं। इस बारे में सभी आयामों से सोच-विचार कर डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने आगे की कार्रवाई की रूपरेखा तय करने के लिए अखिल मुंबई इलाका महार परिषद की ओर से मुंबई में दिनांक 30, 31 मई और 1 जून, 1936 को परिषद का आयोजन किया था। इसी अवसर पर मुंबई इलाका संत समाज की परिषद, मुंबई इलाका मातंग परिषद और राजकीय परिषद का आयोजन भी किया गया था। इस अवसर पर प्रकाशित किए गए पत्रक, कार्यक्रम की जानकारी और डॉ. बाबासाहेब के भाषण यहां दे रहे हैं। डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर के आमूलाग्र समाज परिवर्तन की क्रांति में इन सभी परिषदों का असाधारण और ऐतिहासिक महत्त्व है।

‘ मुक्ति कोन पथे? ’ - इस प्रमुख भाषण के बाद मुंबई इलाका अस्पृश्य संत समाज की परिषद, राजकीय परिषद और मुंबई इलाका मातंग परिषद में हुए डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर के भाषण आगे इसी अनुक्रम से अलग से दिए जा रहे हैं -संपादक)

अखिल मुंबई इलाका महार परिषद आयोजित करने के पीछे की भूमिका व्यक्त करने वाला पत्रक इस प्रकार था -

अखिल अस्पृश्यों के इकलौते नेता, दीनबंधु डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने दिनांक 13 अक्तूबर, 1935 के दिन नासिक जिले के येवले में हुई परिषद में कहा कि, हिंदू धर्म की समाज रचना विषमता की नींव पर खड़ी है, इसलिए हिंदू के रूप में हम इंसानियत के अधिकार पाने के लिए भले कितनी भी कोशिशें क्यों न करें हमें सफलता मिलना मुमकिन नहीं है। आपने महाड, नासिक और अन्य जगहों पर सत्याग्रह करके समानता के अधिकार पाने के लिए कड़ी और जोरदार कोशिश की, लेकिन इस कोशिश में हमारा पैसा और मेहनत ही बर्बाद हुई। सफलता तो मिली ही नहीं, उल्टे हमारे बंधु-बांधवों को गांव-गांव में तरह-तरह के अत्याचार/कष्ट भी सहन करने पड़े, और अभी तक करने पड़ रहे हैं। इसीलिए, अगर आप इंसान के रूप में जीवन बिताना चाहते हैं तो हमें इस हिंदू धर्म से अलग होना चाहिए। यानि, हमें धर्म परिवर्तन करना चाहिए। इसी में हम सभी अस्पृश्यों का कल्याण समाया हुआ है।