7. जागृति की ज्योत को कभी भी बुझने न दें - मार्च 1927 कोलाबा - Page 50

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जमाने में यह अस्पृश्य जाति के लोगों से भरा हुआ था। इसी तरह सफेद पेशा लोगों को छोड़कर अन्य वर्गों की तुलना में अस्पृश्य समुदाय की शिक्षा में आगे था।

यह उन्नति जिन कारणों से हुई उनमें सेना की नौकरियां एक बहुत महत्त्वपूर्ण कारण थी। ब्रिटिश राज शुरू होने से पहले अस्पृश्य लोगों के लिए अपना भविष्य संवारने के लिए कितनी गुंजाइश थी इस बारे में आज कुछ भी निश्चित रूप से कहा नहीं जा सकता। लेकिन उन दिनों छुआछूत की भावनाएं इतनी प्रबल थीं कि स्पृश्यों पर उनकी परछाई भूल से भी ना पड़ जाए, इसलिए अस्पृश्यों को चक्कर काट कर जाना पड़ता था। थूक से रास्ता प्रदूषित होगा इसलिए गले में मटका बांधकर घूमना पड़ता था और पहचाना जा सके इसलिए हाथ में काला धागा बांधना पड़ता था। उस समय प्रगति की गुंजाइश होगी लेकिन बहुत थोड़ी ही रही होगी। जब अंग्रेजों ने इस देश में कदम रखा तब इस प्रांत के अस्पृश्य लोगों को सिर ऊपर उठाने का मौका मिला। उस अवसर का लाभ उठाकर उन्होंने यह साबित कर दिखाया कि उनके भीतर कितना शौर्य, कितना तेज, कितने उच्च दर्जे की बुद्धिमŸा है। यदि इसका सबूत ही चाहिए तो बस पुरानी आर्मी लिस्ट की फाइलें उलट-पलट कर देख लीजिए। यदि मैं विस्तार से बताने लगा कि इस प्रदेष से अस्पृश्य वर्ग के कितने लोग सूबेदार बने, कितने जमादार बने, कितने हवलदार बने, नार्मल स्कूल जैसे स्कूलों में पढ़कर कितने हेडमास्टर के पद तक पहुंचे, कितने लोगों ने एजुटंट क्लर्क और क्वार्टर मास्टर क्लर्क जैसे जिम्मेदारी के पदों पर बखूबी काम किया तो भाषण लंबा हो जाएगा। इतना बताना काफी होगा कि एक समय अस्पृश्य वर्ग केवल सेवक के रूप में ही काम करता था वही वर्ग सेना में नौकरी के कारण अधिकार संपन्न होकर दूसरे वर्गों पर हुकूम चलाने लगा। यह कहने में हर्ज नहीं है कि फौज की नौकरी के कारण हिन्दू समाज की श्रेणीबद्ध रचना में एक क्रांति हुई थी, ऐसा कहने में कोई हर्ज नहीं। जिन महार और चमारों को मराठा और अन्य लोग छूने नहीं देते थे और उनके जोहार और रामराम न करने पर अपमानित महसूस करते थे वही मराठा सिपाही महार और चमार सूबेदार को अदब से सलामी देने लगे और अगर वह -क्यूबे - कह दे तो उनमें आंखे ऊपर करके देखने की हिम्मत नहीं होती थी। यह कहा जा सकता है कि इससे पहले इस देश के किसी भी प्रांत में अस्पृश्य जाति के लोगों को इतना अधिकार नहीं मिला था। इस प्रांत के अस्पृश्य वर्ग के लोगों ने अपना दर्जा ऊंचा किया था और इतना ही नहीं तो शिक्षा के क्षेत्र में काफी प्रगति की थी। उनमें से 90 प्रतिशत लोग साक्षर थे। इतना ही नहीं तो 50 प्रतिशत लोग तो भी ऊंचे दर्जे के शिक्षित थे। खास तौर पर गौर करने की बात यह है कि शिक्षा का प्रसार केवल पुरूषों में ही नहीं तो स्त्रियों में भी था। कुछ स्त्रियां शिक्षा में इतनी प्रवीण थीं कि पुरूषों की सभाओं में पुराणों का अन्वयार्थ बताती थीं। शिक्षा में इस प्रगति का श्रेय सेना का पेशा बहुत हद तक कारण था।