89. ‘मुक्ति कोन पथे?’ - मई 1936 दादर (मुंबई) - Page 490

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स्थानों से आए संदेश पढ़कर सुनाए। उसमें रावजी ठेंगे, रावसाहेब पापण्णा और सरदार केरसिंह से आए संदेश प्रमुख थे। सभी संदेशों में धर्मांतरण की घोषणा का समर्थन किया गया था और प्रोत्साहन दिया गया था।

नियोजित अध्यक्ष श्री. वेंकटराव भाषण करने के लिए उठ खडे़ हुए तो तालियों की मानो गड़गड़ाहट हुई। बुलंद आवाजों में डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकरऔर वेंकटराव के नामों की जयकार हुई। जयकार की ध्वनि रुकी तो अध्यक्ष वेंकटराव ने हिंदी में भाषण किया।

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सम्मेलन में पारित किए गए प्रस्ताव

प्रस्ताव 1 - (अ) मुंबई इलाके की महार जाति की परिषद पूरी तरह सोच-विचार

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के बाद यह घोषित करती है कि महार जाति को समाज में समता और आजादी पाने के लिए धर्म परिवर्तन करना ही एकमात्र उपाय सही लगता है। इसीलिए परिषद अपने एकमात्र नेता डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर को निश्चयपूर्वक सार्वजनिक रूप से आश्वासन देती है कि महार समाज पूरे समुदाय के साथ धर्म परिवर्तन के लिए तैयार है।

(ब) महार परिषद की सूचना है कि, धर्म परिवर्तन की पूर्वतैयारी के अंतर्गत महार लोग हिंदू देवताओं की पूजा न करें, हिंदुओं के त्यौहार-व्रत-उपोषण आदि का पालन न करें, हिंदुओं के किसी भी उत्सव में हिस्सा न लें और तीर्थयात्रा पर न जाएं।

यह प्रस्ताव नासिक के प्रसिद्ध नेता श्री भाऊराव कृष्णराव गायकवाड ने रखा। उनके इस प्रस्ताव का समर्थन किया धारवाड़ के श्री. एस. एस. वराले ने। उन्होंने इस संदर्भ में अपने विचार प्रकट किए। इस प्रस्ताव का समर्थन करते हुए अहमदनगर के श्री. पी. जे. रोहम, जनाबाई मोरे, कु. राजुबाई गायकवाड़, सौ सोनुबाई डावरे, कु. भागिरथीबाई तांबे, कुलाबा के प्रमुख नेता श्री. विश्राम गंगाराम सवादकर के भाषण हुए। पहले हफ्ते में हुए सम्मेलन

30 मई से 2 जून, 1936 तक मुंबई के दादर-नायगाव इलाके में हुई अस्पृश्य बंधुओं की परिषद ने बड़ी हलचल मचा दी। मुंबई इलाका महार परिषद के लिए दादर में प्रचंड मंडप खड़ा किया गया था। इस मंडप को स्व. रमाबाई उर्फ माँसाहब भीमराव अम्बेडकरनगर का नाम दिया गया था। इसके अलावा जिन प्रमुख शहरों के अस्पृश्यों ने अपने स्वाभिमान के, अपनी आत्मनिर्भरता के और समानता के अधिकारों के लिए पिछले कई सालों से आर-पार की टक्करें दी थी, उस ‘महाड़’ और ‘नासिक’