89. ‘मुक्ति कोन पथे?’ - मई 1936 दादर (मुंबई) - Page 493

476 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

किया है। लेकिन सब एक जगह इकट्ठा होकर सोच-विचार कर धर्म परिवर्तन के सवाल पर निर्णयात्मक चर्चा करने का अब तक हमें कोई मौका उपलब्ध नहीं हुआ था। ऐसा अवसर उपलब्ध होने की आपसे अधिक मुझे जरूरत थी। एक बात आप सब मानेंगे कि धर्म परिवर्तन की मुहिम सफल हो इसके लिए पहले से तैयारी करना बहुत ही आवश्यक होता है। धर्म परिवर्तन करना कोई बच्चों का खेल नहीं। धर्म परिवर्तन मौज-मजे की बात भी नहीं है। यह इंसान के जीवन की सफलता से संबंधित है। जहाज से एक बंदरगाह से दूसरे बंदरगाह तक की यात्रा करने के लिए जितनी तैयारी की जरूरत होती है, उतनी ही तैयारी धर्म परिवर्तन के लिए करनी पडे़गी। उसके बगैर इस किनारे से उस किनारे तक पार लग पाना संभव नहीं है। लेकिन नाव में कितने यात्री आ रहे हैं, इसका अंदाजा लगने तक नाविक सामान इकट्ठा करने की तैयारी में नहीं लगता। मेरी हालत भी कुछ-कुछ इसी तरह की है। कितने लोग धर्म परिवर्तन के लिए तैयार हैं इसका अंदाजा जब तक नहीं आता तब तक मेरे लिए धर्म परिवर्तन की पूर्व तैयारी करने का काम शुरू करना असंभव है। अपने लोगों की कहीं परिषद का आयोजन किए बगैर लोगों के मतों का अंदाजा लगा पाना संभव नहीं था। लोगों के मत आजमाने का अवसर मुझे मिलना चाहिए, ऐसा मैंने जब मुंबई के कार्यकŸार्ओं से कहा तब खर्चे या मेहनत का बहाना आगे किए बिना परिषद का आयोजन करने की जिम्मेदारी खुशी-खुशी अपने ऊपर ले ली। वह जिम्मेदारी पार लगे, इसके लिए उन्हें क्या-क्या कष्ट उठाने पडे़, इस बारे में आपके परमपूज्य नेता और स्वागत समिति के अध्यक्ष राजमान्य राजश्री रेवजी दगडूजी डोलस ने अपने भाषण में सविस्तार सुनाया है। इतने कष्ट उठा कर उन्होंने मेरे लिए इस सभा का आयोजन किया, इसके लिए मैं परिषद की स्वागत समिति का अत्यंत आभारी हूं।

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केवल महारों का ही सम्मेलन क्यों?

हो सकता है कुछ लोग यह पूछते हुए इस परिषद पर आपिŸा जताएं कि, धर्म परिवर्तन की मेरी घोषणा अगर सभी अस्पृश्यों के लिए है, तो फिर सभी अस्पृश्यों की सभा के बदले केवल महारों की ही सभा क्यों बुलाई गई? जिन सवालों के बारे में इस परिषद में हमें चर्चा करनी है, उन प्रश्नों पर चर्चा शुरू करने से पहले इस सवाल का जवाब देना मुझे आवश्यक लगता है। महारों की सभा ही क्यों बुलाई, सभी अस्पृश्यों की सभा क्यों नहीं बुलाई, इसकी कई वजहें हैं। पहला कारण यह है कि इस परिषद में किसी भी तरह की मांगें नहीं रखनी हैं। सरकार से किसी तरह के राजनीतिक अधिकार नहीं मांगने हैं और न ही हिंदुओं से कुछ सामाजिक अधिकार मांगने हैं। अपनी जिंदगी का क्या करना है, अपने जीवन की कैसी रूपरेखा बनानी है केवल यही एक सवाल इस परिषद के सामने है। यह प्रश्न ऐसा है जिसे हर जाति अपने स्तर पर हल कर सकती है और हर जाति इसे अपने स्तर पर अलग से सोच-विचार कर हल