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है। यह किसी व्यक्ति पर किए गए आरोपों से उद्भुत कलह नहीं है। किसी एक व्यक्ति के प्रति हो रहे अन्याय की भी यह कलह नहीं है। एक वर्ग द्वारा दूसरे वर्ग के साथ की हुई ज्यादती से संबंधित यह कलह है। यह वर्गकलह सामाजिक दर्जे के बारे में है। एक वर्ग को दूसरे वर्ग के साथ कैसे बर्ताव करना चाहिए इस बारे में यह विवाद है। ऊपर जो उदाहरण दिए हैं, उनसे इस कलह के बारे में जो बात साफ तौर पर सामने आती है, वह यह है कि ऊंचे वर्ग के साथ पेश आते समय आप हमेशा बराबरी से पेश आने का आग्रह करते हैं। इसीलिए यह कलह पैदा होती है। अगर ऐसा नहीं होता तो रोटी खाने से, ऊंची पोषाक पहनने से, जनेऊ धारण करने से, पीतल-तांबे के बर्तनों में पानी लाने से, घोडे़ पर बारात लेकर जाने से, यह झगडे़ नहीं होते। जो अस्पृश्य चपाती खाता है, ऊंचे वस्त्र परिधान करता है, तांबे के बर्तन इस्तेमाल करता है, घोडे़ पर बैठ कर बारात लेकर जाता है वह ऊंचे वर्ग के किसी का नुकसान नहीं करता। इन सब बातों के लिए अपने ही पैसे खर्च करता है। ऐसा अगर है तो ऊंचे वर्ग को उसके बारे में बुरा क्यों लगता है? इस गुस्से का कारण एक ही है, वे मानते हैं कि इस तरह का समान बर्ताव उनकी मानहानि, अपमान का कारण है। आप निम्न हैं, अपवित्र हैं, आप अगर निम्न स्तर का जीवन बिताएंगे, तभी वे आपको सुख से रहने देंगे। अपनी औकात से बढ़ कर बर्ताव करने पर ही तो कलह की शुरुआत होती है, यह बात निर्विवाद सत्य है। इस उदाहरण से एक और बात साबित होती है कि अस्पृश्यता रोजमर्रा की बात है, नैमिŸाक या कभी-कभार की बात नहीं। साफ तौर पर कहना हो तो स्पृश्य और अस्पृश्य के बीच कलह रोजमर्रा की है, और वह हमेशा, त्रिकालाबाधित रहने वाली है। क्योंकि जिस धर्म के कारण आपको निचला दर्जा दिया गया है, वह धर्म ऊंचे वर्ग के कथनानुसार सनातन है। समय के अनुसार उसमें किसी भी तरह का बदलाव होना असंभव है। आज आप जिस तरह निम्न वर्ग के हैं, उसी तरह आपको हमेशा निम्न वर्ग के बन कर रहना होगा। इसका मतलब यही है कि स्पृश्य और अस्पृश्य के बीच का यह कलह/विवाद हमेशा ऐसा ही रहने वाला है। इस कलह के साथ आप कैसे निपटेंगे, यह असली समस्या है। इस प्रश्न के बारे में सोचने के अलावा आपके सामने कोई चारा नहीं है, ऐसा मुझे लगता है। आप में से जिन लोगों को, हिंदू लोग जैसे आपके साथ बर्ताव करेंगे उसी के अनुसार रहना है, उनकी सेवा करते हुए जीना है, उन्हें इस बारे में सोचने की जरूरत नहीं है। लेकिन जिन्हें स्वाभिमान के साथ जीवन यापन करना आवश्यक लगता है, जिन्हें समता के साथ जीना आवश्यक लगता है, उनके सामने इन सवालों के बारे में सोचने के अलावा कोई चारा नहीं है। उन्हें इस बात पर सोचना पडे़गा कि इस कलह से हम अपना बचाव कैसे कर सकते हैं? इस सवाल को हल करना मुझे बहुत कठिन नहीं लगता। यहां एकत्रित हुए आप सभी लोगों को एक बात माननी होगी और वह यह कि जिसके हाथ में ताकत/सामर्थ्य