89. ‘मुक्ति कोन पथे?’ - मई 1936 दादर (मुंबई) - Page 497

480 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

होता है, जय/जीत उसी की होती है। जिसके पास ताकत/सामर्थ्य नहीं उसे सफलता पाने की आशा नहीं रखनी चाहिए। यह बात सबके अनुभव से साबित हुई है। उसके समर्थन में सबूत देने की जरूरत नहीं है। पहले सामर्थ्य प्राप्त करें

इससे आगे वाले जिस सवाल पर आपको ध्यान देना होगा वह है - इस कलह से पीछा छुड़ाने के लिए जरूरी ताकत/सामर्थ्य क्या आपके पास है? इंसान के पास तीन तरह की सामर्थ्य होती है - मनुष्यबल, द्रव्यबल और मानसिक बल। इन तीनों में से कौन सा बल आपके पास है, ऐसा आपको लगता है? मनुष्यबल के हिसाब से आप अल्पसंख्यकों में आते हैं, यह बात सब जानते हैं। मुंबई इलाके में अस्पृष्य वर्ग की जनसंख्या कुल जनसंख्या के आठवें हिस्से (साढ़े बारह फीसदी) जितनी ही है। जो हैं वे भी संगठित नहीं हैं। जातिभेद के कारण उनमें संगठनात्मक शक्ति का पूरी तरह अभाव है। संगठन नहीं और इकट्ठा, एक साथ भी नहीं हैं। वे गांव-गांव में बिखरे हुए हैं। इस वजह से जो अल्पसंख्या में मनुष्यबल है उसका भी संकटग्रस्त अस्पृश्यों की बस्ती के लिए कोई उपयोग नहीं है। द्रव्यबल के नजरिए से देखें तब भी आपकी वही हालत है। आपके पास थोड़ा-बहुत मनुष्यबल है ऐसा तो कहा जा सकता है लेकिन आपके पास द्रव्यबल बिल्कुल नहीं, यह बात साफ है। आपके पास कोई व्यापार नहीं, उद्यम नहीं, नौकरी नहीं और खेती भी नहीं है। उच्च वर्ग के लोग जो भी मेहनताना, पारिश्रमिक देंगे, उसी पर आपका गुजारा चलता है। आपके पास अनाज नहीं, वस्त्र नहीं, आपके पास द्रव्यबल होगा तो क्या होगा? अन्याय हो तो कोर्ट से न्याय मांगने की औकात आपकी नहीं है। कोर्ट का खर्चा उठा न पाने के कारण आपमें से कई लोग हिंदुओं से होने वाले अत्याचार, अपमान, और जोर-जुल्म चुपचाप सह रहे हैं। इससे भी अधिक आपके पास मानसिक बल की कमी है। सैंकड़ों साल उच्च जातियों की सेवा में बिताने के कारण सैंकड़ों सालों से उनके द्वारा किए गए अपमान सहने की, उनके द्वारा की गई जिल्लत चुपचाप पी लेने के कारण पलट कर जवाब देने की आदत, विरोध करने की हिम्मत खत्म हो चुकी है। आपका आत्मविश्वास, उत्साह, महत्वाकांक्षा हार चुकी है। आपमें से सभी लोग हताश, दीन और निस्तेज हो चुके हैं। निराशा का, पराजय का वातावरण सब दूर फैला हुआ है। कोई यह सोच ही नहीं पा रहा है कि यदि दृढ़ निश्चय करें तो हम भी कुछ कर सकते हैं। आप पर ही अत्याचार क्यों होते हैं?

मैंने जो यथास्थिति का वर्णन किया है वह यदि सच है, तो उससे निकलने वाला सिद्धांत आप सबको मानना होगा। वह सिद्धांत है- अगर आप अपने बल के भरोसे