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रहेंगे तो इस जुल्म का विरोध आप नहीं कर पाएंगे। आपमें सामर्थ्य नहीं है, इसीलिए आप पर जुल्म होते हैं इस बारे में मुझे कोई शक नहीं। इस इलाके में आप ही केवल अल्पसंख्यक हैं, ऐसी बात नहीं है। मुसलमान भी आप ही की तरह अल्पसंख्यक हैं। गांव में जिस तरह महार-मांगों के दो-चार घर होते हैं उसी तरह मुसलमानों के भी दो-चार घर ही होते हैं। किंतु उन मुसलमानों को कोई परेशान नहीं करता। लेकिन आपके साथ हमेशा जुल्म होते रहते हैं, इसकी वजह क्या है? मुसलमानों के भी दो ही घर होते हैं, लेकिन कोई उन पर अत्याचार नहीं करता। आपके दस घर होते हैं, फिर भी पूरा गांव आपके पीछे पड़ा रहता है, ऐसा क्यों? इसके बारे में आपको अच्छी तरह से सोचना होगा। मेरे विचार में इसका एक ही जवाब दिया जा सकता है कि उन दो मुसलमान घरों के पीछे पूरे भारत के मुसलमानों का सामर्थ्य और ताकत खड़ी होती है। हिंदू लोग इस बारे में जानते हैं, इसी कारण उन दो मुसलमानों से पंगा लेने की साधारणतः किसी की हिम्मत नहीं होती। उन दो घरों के पीछे अगर कोई पड़,े तो पंजाब से लेकर मद्रास तक मुसलमान समाज अपनी पूरी ताकत के साथ उनके पीछे खड़ा हो जाता है। उन दो परिवारों को इसका पूरा अहसास होता है, इसीलिए पूरी निर्भयता के साथ वे अपना जीवन-यापन करते रहते हैं। आपके बारे में हिंदू लोगों को यकीन होता है कि आपकी कोई भी मदद नहीं करेगा। आपके लिए कोई दौड़ा-दौड़ा नहीं आएगा। आपको रुपयों की मदद कोई नहीं देगा और कोई अधिकारी भी आपके पीछे खड़ा नहीं रहेगा। मामलतदार और पुलिस भी उन्हीं में से होते हैं, जो स्पृश्य अस्पृश्य के विवाद में आखिर अपनी जाति के साथ हो जाते हैं। वे कर्त्तव्य का नहीं, जाति का साथ देते हैं। हिंदुओं को यह बात पता होती है। आपकी इसी असहाय स्थिति के चलते हिंदू लोग आपके साथ जुल्म करते हैं, अन्याय करते हैं। इस विवेचन से दो बातें प्रमाणित होती हैं - पहली, सामर्थ्य के बगैर आप इस अन्याय का प्रतिकार नहीं कर पाएंगे। दूसरी बात यह कि विरोध के लिए जरूरी ताकत आज आपके पास नहीं है। इन दो बातों के साबित होते ही एक और बात अपने आप साबित हो जाती है, वह यह कि आपको जिस सामर्थ्य की जरूरत है, वह आपको बाहर कहीं से प्राप्त करना होगा। आप यह ताकत, सामर्थ्य कहां से पाएंगे, यही असल में बेहद महत्त्वपूर्ण सवाल है। आपको
खुले दिमाग से इस पर विचार करना चाहिए।
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हमें बाहर से सामर्थ्य प्राप्त करना होगा
इस देश में जातियों और धर्म से उपजे भेदभाव का लोगों के मन पर और उनकी नीतिमŸा पर अजीब परिणाम हो चुका है, ऐसा मुझे लगता है। दुख, दरिद्रता, क्लेष के बारे में यहां किसी को बुरा नहीं लगता। और अगर कभी लगा भी तो उसे खत्म करने की कोई कोशिश नहीं करता। अपने धर्मबंधुओं पर अथवा अपने जातिबांधवों