89. ‘मुक्ति कोन पथे?’ - मई 1936 दादर (मुंबई) - Page 499

482 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

पर दुख, जुल्म अथवा दरिद्रता का पहाड़ यदि टूटता है तो उसके निवारण के लिए लोग मदद करते हैं। कोई भी यह ना भूलें कि नीति/नैतिकता की यह बात भले जितनी भी विकृत हो तब भी अभी तक जारी है। जिन गांवों में अस्पृश्य लोगों पर हिंदूओं द्वारा जुल्म किए जाते हैं, उस गांव में दूसरे धर्म के लोग होते ही नहीं हैं, ऐसी बात नहीं है। अस्पृश्यों के साथ हो रहे अत्याचार गलत हैं, ऐसा उन्हे भी लगता है। लेकिन जो हो रहा है, वह अन्याय है, यह जान कर भी वे मदद के लिए आगे नहीं आते। आप हमारी मदद क्यों नहीं करते? ऐसा अगर आप उनसे पूछें तो आपके टंटे में हम क्यों पडें़? आप अगर हमारे धर्म के होते तो हम आपकी मदद जरूर करते, ऐसा जवाब वे आपको देते हैं। इससे एक बात आपके ध्यान में आएगी कि किसी और धर्म से जब तक आप अपना संबंध स्थापित नहीं करेंगे, किसी और धर्म में जब तक आप शामिल नहीं होंगे तब तक आपको बाहरी सामर्थ्य प्राप्त नहीं होगा। इसका साफ-साफ मतलब यही होता है कि आपको धर्म परिवर्तन कर किसी अन्य धर्म में शामिल होना पडे़गा। उसके बगैर आपको उस समाज का सामर्थ्य प्राप्त नहीं होगा। जब तक आपके पास ताकत/सामर्थ्य नहीं, तब तक आपको आपकी भावी पीढ़ी को भी आज की आपकी जैसी हालत है, उसी हालत में दिन बिताने पड़ेंगे।

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ऐहिक कल्याण के लिए धर्म परिवर्तन की क्या आवश्यकता है, यह हमने अब तक देखा। अब आध्यात्मिक कारणों के लिए धर्म परिवर्तन की आवश्यकता कैसे है, इस बारे में मैं आपके सामने अपने विचार प्रस्तुत करने जा रहा हूं। पहले यह जान लेना जरूरी है कि धर्म क्या है? किसलिए है? धर्म के बारे में आपको कई लोगों की दी हुई कई परिभाषाएं मिलेंगी। लेकिन उन सबमें जो सबकी समझ में आए ऐसी अर्थपूर्ण एक ही परिभाषा है कि- जिससे सारी प्रजा का उद्धार हो वही धर्म है। यही धर्म की सच्ची परिभाषा है। मैंने यह परिभाषा नहीं दी है। सनातनी हिंदुओं के अग्रगण्य नेता लो. बाल गंगाधर तिलक की यह परिभाषा दी हुई है। सो, मैंने धर्म की इस परिभाषा के साथ छेड़छाड़ की, ऐसा आरोप कोई मुझ पर लगा नहीं सकता। मैंने यह परिभाषा नहीं की है लेकिन विवाद के लिए मैं इसे मान रहा हूं, ऐसा भी नहीं है। मैं इस परिभाषा को मानता हूं। समाज के भले के लिए जो बंधन डाले जाते हैं, वही धर्म है। धर्म के बारे में मैं भी यही सोचता हूं। वास्तविक दृष्टि से हो, या तार्किक दृष्टि से यह व्याख्या अगर सही लगती है, तो समाज के उद्धार के लिए समाज के बंधन किस तरह के होने चाहिएं, इस सवाल के जवाब में इस परिभाषा से कोई जवाब नहीं मिलता। न कोई बात स्पष्ट हो पाती है। समाज के उद्धार के लिए समाज के बंधन किस तरह के होने चाहिएं, यह सवाल बाकी बचता