89. ‘मुक्ति कोन पथे?’ - मई 1936 दादर (मुंबई) - Page 500

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है और यह सवाल धर्म की परिभाषा से बहुत अधिक महत्वपूर्ण है। क्योंकि, धर्म क्या है और अधर्म क्या है, यह किसी परिभाषा पर आधारित नहीं होता। यह उन बंधनों के उद्देश्य पर और उनके स्वरूप पर निर्भर करता है। जिन बंधनों के कारण समाज के सभी लोगों का उद्धार हो सके, वे किस तरह के होने चाहिए? यानी, सच्चे धर्म का स्वरूप किस तरह का हो, इस मुद्दे पर सोचते हुए एक सवाल उभरता है कि समाज और व्यक्ति का सैद्धांतिक संबंध किस तरह का होना चाहिए? इस सवाल पर समाजशास्त्र के विद्वानों ने तीन तरह के मत व्यक्त किए हैं। कुछ विद्वानों के मतानुसार - व्यक्ति को सुख की प्राप्ति हो यही समाज के बंधनों का अंतिम उद्देश्य होता है। कुछ लोगों के मतानुसार सामाजिक बंधनों का प्रमुख उद्देश्य ऐसा हो जिनसे व्यक्ति के गुणों का और शक्ति का विकास हो और उसे पूर्णावस्था में पहुंचने में वे मददगार साबित हों। कुछ और लोगों का यह मानना है कि सामाजिक बंधनों का उद्देश्य व्यक्ति की सुख प्राप्ति या उसकी उन्नति न होकर आदर्श समाज तैयार करना ही होना चाहिए। हिंदू धर्म की कल्पना इन तीनों से बिल्कुल अलग है। हिंदू धर्म में व्यक्ति का कोई स्थान नहीं है। हिंदू धर्म की रचना वर्ग की कल्पना पर आधारित है। एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के साथ कैसे पेश आए, इसकी सीख हिंदू धर्म नहीं देता। एक वर्ग दूसरे वर्ग के साथ कैसे बर्ताव करे इसके बारे में हिंदू धर्म बताता है। जिस धर्म में व्यक्ति की अहमियत नहीं, उस धर्म को मेरी मान्यता नहीं। व्यक्ति के जीवन के लिए समाज की भले आवश्यकता हो, लेकिन सामाजिक बंधन धर्म का अंतिम उद्देश्य नहीं हो सकता। व्यक्ति का विकास ही धर्म का सच्चा उद्देश्य है, ऐसा मैं मानता हूं। व्यक्ति समाज में भले रहता हो, मनुष्य भले समाज का एक हिस्सा हो, लेकिन उसका और समाज का संबंध शरीर और विभिन्न अंग, गाड़ी और पहिए के संबंध जैसा होता है, ऐसा मैं नहीं मानता हूं।

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पानी की बूंद जब समंदर में डाली जाती है, तब जिस तरह वह सागर के पानी के साथ एकाकार हो जाती है, उस तरह समाज में रहने से आदमी का लोप नहीं हो सकता। हर व्यक्ति का जीवन अलग होता है, उसका जन्म समाज की सेवा के लिए न होकर आत्मोन्नति के लिए है। इसी एक वजह से उन्नत राष्ट्रों में एक आदमी दूसरे आदमी को अपना गुलाम बना कर नहीं रख सकता। जिस धर्म में व्यक्ति को प्रधानता नहीं है, उस धर्म को मैं नहीं मानता। और हिंदू धर्म में व्यक्ति को प्रधानता नहीं है, इसलिए जाहिर है कि मैं इस धर्म को नहीं मानता। साथ ही जो धर्म यह बताता है कि एक वर्ग विद्या सीखेगा, दूसरा वर्ग केवल शस्त्र धारण करेगा, तीसरा वर्ग व्यापार करेगा और चौथा वर्ग इन तीनों वर्गों की केवल सेवा करेगा, उस धर्म को मैं नहीं मानता। विद्या हरेक को मिलनी चाहिए। शस्त्र की हरेक को जरूरत होती