7. जागृति की ज्योत को कभी भी बुझने न दें - मार्च 1927 कोलाबा - Page 51

34 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

बहुत सारे लोग खेद प्रगट कर कहते हैं कि अंग्रेजों का राज शुरू होकर 150 वर्ष हो गए फिर भी प्राथमिक शिक्षा को निःशुल्क और अनिवार्य नहीं बनाया गया। और कहते हैं कि कम से कम अब तो इसे शुरू किया जाए। उन्हें एक बात पता नहीं है एसा लगता है। शिक्षा प्रेमी लोग हमेशा ईस्ट इंडिया कंपनी पर आरोप लगाते हैं कि कंपनी ने शासन करते हुए केवल अपने फायदे पर ध्यान दिया लोगों की शिक्षा की तरफ ध्यान ही नहीं दिया । यह आरोप पूरी तरह से सही नहीं है। कम से कम कंपनी के मिलिट्री विभाग के बारे में तो यह साफ झूठ है। जिन्होंने पीढ़ी-द- पीढ़ी मिलिट्री में नौकरी की है वे गवाही दे सकते हैं कि कंपनी के राज में शिक्षा मुफ्त और अनिवार्य थी। प्राथमिक शिक्षा लड़कों के साथ ही लड़कियों को भी समान रूप से दी जाती थी। लड़कों के लिए तो प्राथमिक शिक्षा के अलावा माध्यमिक शिक्षा भी अनिवार्य थी। अनिवार्यता इतना आसान मामला भी नहीं था। बच्चा स्कूल न जाए तो अभिभावक जुर्माना भर कर छूट नहीं सकते थे। एक खासतौर पर ध्यान देने की बात यह है कि यह सख्ती केवल बच्चों तक ही सीमित नहीं थी। नए भर्ती हुए वयस्क रिक्रूटों को भी रात के स्कूल में जाना अनिवार्य था। कंपनी का राज खत्म होने के बाद अंग्रेज बादशाह का राज शुरू हुआ और सŸावन की बगावत को दबाने के बाद जब अंग्रेज सरकार ने भारत की सैन्य संबधी जांच करने के लिए कमीशन गठित किया तो उसमें कई गवाहों ने कहा यदि सेना में शिक्षा का प्रसार हुआ तो अनर्थ हो जाएगा। उससे भयभीत होकर मिलिट्री विभाग में जारी शिक्षा की तरफ पहली बार अनदेखी की गई और फिर उसे बिल्कुल ही खत्म कर दिया गया। खैर जब तक यह शिक्षा जारी थी तब तक अस्पृश्य वर्ग का काफी फायदा हुआ। उन्होंने इस शिक्षा का जितने अच्छे ढंग से उपयोग किया उस पर गर्व होना स्वाभाविक है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि इस शिक्षा प्रसार के कारण अस्पृश्यों के पास जो ग्रंथसंग्रह हुआ वह उनकी संख्या की तुलना में असामान्य था। श्रीधरस्वामी के हस्तलिखित ग्रंथ तो इतने मिल जाएंगे की कई गाडि़यां भर जाएं। लेकिन मुकंदराज, ज्ञानेश्वर, मुक्तेश्वर आदि महाराष्ट्र के पुराने और महान कवियों के ग्रंथों की हस्तलिखित प्रतियां मैंने कई-कई अस्पृश्यों के संग्रह में देखीं हैं। मेरा विश्वास है कि अस्पृश्यों के यहां कई दुर्लभ ग्रंथ मिल सकते हैं। यह बात कम प्रचलित है कि ज्ञानेश्वर महाराज ने पंचीकरण नामक ग्रंथ लिखा था। लेकिन मैंने इस ग्रंथ को मेरे एक दिवंगत मित्र के घर देखा था। कुछ वर्ष पहले श्री पांगारकर ने केसरी में विज्ञापन दिया था किसी के पास राघव चितघन कवि कालिखा -ज्ञानसुधा - पुस्तक हो तो सूचित करे। यदि उन्हें इस पुस्तक की हस्तलिखित प्रति नहीं मिली हो तो उन्हें यह पुस्तक मेरे एक अस्पृश्य मित्र के घर देखने को मिल सकती है। जिन अस्पृश्य जाति के लोगों के लिए जब ज्ञान के सारे दरवाजे बंद थे उस समय उन्हें इस तरह का ग्रंथ संग्रह करने के लिए कितने कष्ट उठाने पड़े होंगे और कितना