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यह प्रश्न तो पूछा भी नहीं जाना चाहिए। अस्पृश्यता प्रत्यक्ष असमानता है। असमानता
की इतनी उग्र ज्वाला और कहीं देखने को नहीं मिलेगी। अस्पृश्यता से अधिक उग्र
असमानता दुनिया के इतिहास में कहीं देखने को नहीं मिलेगी। कमतरी-बेहतरी के
कारण आपस में रोटी-बेटी व्यवहार न होना इसी असमानता का निदर्शक है। लेकिन
एक व्यक्ति द्वारा दूसरी व्यक्ति को न छूने जैसी, उसे पतित मानने जैसी परंपरा हिंदू
धर्म के अलावा तथा हिंदू समाज के अलावा अन्यत्र कहीं भी देखने को नहीं मिलेगी।
जिसके स्पर्श से इंसान भ्रष्ट हो जाता है, जिसके स्पर्श से पानी भ्रष्ट होता है, जिसके
स्पर्श से भगवान तक अपवित्र हो जाते हैं, वह मानवप्राणि ही है, यह कोई कैसे माने?
अस्पृश्य व्यक्ति की ओर देखने की दृष्टि और कोढ़/रक्तपिŸा से पीडि़त व्यक्ति की
तरफ देखने की दृष्टि में आखिर फर्क क्या है? कोढ़ से पीडि़त व्यक्ति के बारे में
लोगों के मन में भले घिन हो, लेकिन सहानुभूति भी होती है। लेकिन आपके बारे में
सहानुभूति तो नहीं ही होती घिन जरूर होती है। रक्तपिŸा/कोढ़ से ग्रसित इंसान
से भी आपकी स्थिति हीन है। आज भी गांव में कोई स्पृश्य व्यक्ति जब व्रत खोलता
है, तब अगर महार का शब्द उसके कानों से टकराए तो वह अन्न ग्रहण नहीं करता।
आपके शरीर के साथ, आपके शब्दों की आवाज के साथ इतना कलंकभाव जुड़ा हुआ
है। कुछ लोग कहते हैं कि अस्पृश्यता हिंदू धर्म का कलंक है। लेकिन सच पूछिए
तो उसके कोई मायने नहीं हैं। हिंदू धर्म कलंकित है, ऐसा एक भी हिंदू नहीं मानता।
आप कलंकित हैं, दूषित हैं, अपवित्र हैं, ऐसा बहुसंख्यक हिंदू समाज मानता है। आप
इस हालत में कैसे पहुंचे? मुझे लगता है कि हिंदू धर्म में रहने के कारण आपकी
यह हालत हुई है। आपमें से जो मुसलमान हुए उन्हें हिंदू लोग अस्पृश्य नहीं मानते,
असमान नहीं मानते। आप में से जो लोग ईसाई बने, उन्हें हिंदू लोग अस्पृष्य या
असमान नहीं मानते। त्रावणकोर में हाल ही में जो घटना घटी, वह सोचने लायक
है। वहां की थिया जाति के अस्पृश्यों को रास्ते पर चलने की मनाही है। हाल ही
में उनमें से कुछ लोगों ने सिक्ख धर्म स्वीकारा यह आप शायद जानते ही होंगे।
अस्पृश्य थे तब उन लोगों के लिए, जिन रास्तों पर से चलने, गुजरने की मनाही थी,
सिक्ख धर्म स्वीकारते ही उन पर से वह पाबंदी हटा दी गई। इन सभी घटनाओं से
एक बात साफ है कि आपकी अस्पृश्यता और असमानता की यदि कोई वजह है तो
वह है, आपका और हिंदू धर्म का आपसी संबंध। असमानता के इस अन्याय में कुछ
स्पृश्य लोग, अस्पृश्यों से उन्हें सांत्वना देते हुए कहते हैं कि आप शिक्षा लो, तब हम
आपको छुएंगे! आप साफ-सुथरे रहें, तो हम आपको छुएंगे! समानता से पेश आएंगे।
सच पूछिए तो अनपढ़, दरिद्री महार का जो हाल है, वही शिक्षित, पैसे वाले और
साफ-सुथरा रहने वाले महार की भी वही बदतर स्थिति होती है। आप-हम सबका