89. ‘मुक्ति कोन पथे?’ - मई 1936 दादर (मुंबई) - Page 503

486 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

अनुभव हमें यही बताता है। लेकिन यदि वह अनुभव हम कुछ पलों के लिए अलग भी रख दें, तो यह सवाल बाकी रहता है कि अगर हाथ में पैसा नहीं हुआ, बदन पर महंगी पोषाक नहीं हुई, शिक्षा नहीं ली तो समानता पूर्ण व्यवहार मान्यता न मिले तो आम महार क्या करे? जिसे शिक्षा प्राप्त नहीं हो सकती वह क्या करे? जिसे पैसा नहीं मिल सकता वह क्या करे? जिसे पैसा नहीं मिलता और जो ठीक-ठाक कपडे़ नहीं पहन पाता, वह क्या करे? उसे समानता कैसे मिलेगी? ईसाई धर्म में, मुसलमान धर्म में, समानता की जो शिक्षा दी गई है, उसका ताल्लुक विद्या, धन, पोषाक, वीरता आदि बाहरी चीजों से बिल्कुल नहीं है। इंसान का इंसान होना ही महत्त्वपूर्ण है, ऐसा इन दोनों धर्मों में माना जाता है। और इंसान होना ही, सबके लिए आदरणीय होना जरूरी है। ये दोनों धर्म सिखाते हैं, कोई किसी का अपमान ना करे, कोई किसी को अपने से नीचा, असमान न माने। हिंदू धर्म में, इस सीख का पूरी तरह से अभाव है। जिस धर्म में मनुष्य के मनुष्यत्व की कोई कीमत नहीं, वह धर्म किस काम का? और ऐसे धर्म को सीने से लगाकर रखने में फायदा क्या है? इसके जवाब में कुछ हिंदू लोग उपनिषद का साक्ष्य देते हैं और शेखी बघारते हैं कि ईश्वर सब जगह व्याप्त है। विज्ञान और धर्म दोनों बातें बिल्कुल अलग-अलग हैं। कोई बात वैज्ञानिक सिद्धांत है, या धर्म की दी हुई सीख है, इसके बारे में सोचना चाहिए। लोग मानते हैं कि सबमें एक ही ईश्वर का वास है यह वैज्ञानिक सिद्धांत है। धर्म के सिद्धांतों का, बर्ताव से संबंध होता है, विज्ञान से नहीं। सबमें एक ईश्वर का वास धर्म की दी गई सीख नहीं है। यह वैज्ञानिक तथ्य हैं। हालांकि, हिंदू लोग इस बात को मान कर नहीं चलते, यही मैं आपको बताना चाहता हूं। यह एक तरह से सबूत ही हैं। उल्टे, मैं तो यह कहूं कि, अगर हिंदू कहते हैं कि सबके अंदर एक ही ईश्वर का वास होता है, यह हिंदू धर्म का सिद्धांत है, बुनियाद है और इसीलिए हमारा धर्म श्रेष्ठ है तो, मैं उनसे बस इतना ही कहना चाहता हूं कि, उनके जितने नीच लोग दुनिया में और कोई नहीं होंगे! मुंह से ‘ सर्वांभूति ईश्वर ’ का जाप करने वाले और अपने कृत्यों से प्राणि मात्रों का अपमान करने वाले लोगों के बारे में कहा जा सकता है कि वे ‘ मुख में राम बगल में छुरी ’ या ‘ वाणी महानुभाव की लेकिन करनी कसाई की ’ वाले लोगों में ही शामिल करने लायक हैं। सबमें एक ही परमात्मा का वास है मानने वाले और अपनी कृति से इंसान को पशु तुल्य ठहराने वाले लोग दांभिक हैं। उनका साथ न दें! चींटियों को चीनी खिलाने वाले और इन्सानों को पानी पर पाबंदी लगाकर उन्हें तड़प-तड़प कर मरने पर मजबूर करने वाले लोग इन्सानियत के दुश्मन हैं। उनके संग के कारण आप पर क्या असर हुआ है, इसका आपको पता ही नहीं है। आपकी इज्जत गई, मानसम्मान गया! सच कहें तो हिंदू समाज में ही आपका कोई मानसम्मान नहीं है, यह कहना वास्तविकता को नापना हो तो कम है। आपको केवल हिंदू लोग ही अस्पृश्य नहीं मानते वरन, मुसलमान और ईसाई लोग भी आपको नीचा समझते हैं। सच कहें