89. ‘मुक्ति कोन पथे?’ - मई 1936 दादर (मुंबई) - Page 506

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नहीं करता, जो अपनी बुद्धि के अनुसार अपने जीवन का उद्देश्य क्या हो तथा अपनी जिंदगी किस तरह व्यतीत करनी है, ये बातें खुद तय करता है यानी, जो पूरी तरह स्वाधीन है, वही व्यक्ति स्वतंत्र है, ऐसा मैं मानता हूं।

इस दृष्टि से देखा जाए तो क्या आप स्वतंत्र हैं? अपना जीवन और उस जीवन के उद्देश्य क्या आपके स्वाधीन हैं? मेरे मत में आप आजाद तो बिल्कुल नहीं हैं, आप दास हैं। सेवक हैं इतना ही नहीं आपके दास्यत्व की कोई सीमा नहीं है। हिंदू धर्म में किसी को भी सोचने की आजादी नहीं मिलती। जो-जो लोग हिंदू धर्म में रहेंगे उनके लिए अपनी विचारों की आजादी को तिलांजलि देना, अपनी स्वतंत्रता त्याग देना अनिवार्य है। उसका बर्ताव वेदों की तरह होना चाहिए। वेदों में अगर वैसी आज्ञा न हो, तो स्मृतियों की आज्ञा का पालन करना होगा। स्मृतियों में वैसी आज्ञा न हो, तो महाजनों के कदमों की लीक पर चलना होगा। हिंदू धर्म में बुद्धि का, विचारों का महत्व तो है ही नहीं, गुंजाइश भी नहीं है। हिंदू है तो उसे किसी न किसी की गुलामी तो करनी ही होगी। वेदों की गुलामी करें, स्मृतियों की गुलामी करें या फिर महाजनों का अनुसरण करें - अपनी सोचने-समझने की शक्ति का उसे बिल्कुल इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। जब तक आप हिंदू धर्म में हैं, तब तक आपको सोचने की आजादी नहीं मिल सकती। कोई यह भी कह सकता है कि हिंदू धर्म ने केवल आप की ही सोचने की आजादी हर ली है, छीन ली है, ऐसा नहीं है, हिंदू धर्म को मान कर चलने वाली सभी जाति की मानसिक आजादी हर ली है। हिंदू धर्म के कारण सभी लोग बौद्धि क गुलामी में फंसे हुए हैं, यह बात सही है, लेकिन इसके कारण वे सब समदुखी हैं, ऐसी बात नहीं है। क्योंकि इस बौद्धिक गुलामी के बुरे परिणाम सब को भोगने नहीं पड़ते। स्पृश्य वर्ग के ऐहिक सुखों पर इस बौद्धिक गुलामी का कोई भी असर नहीं होता। वे अगर वेदों के गुलाम हुए, स्मृतियों के दास बने, महाजनों के मतानुसार चले, तब भी हिंदू समाज के व्यवहार में उन्हें वेदों ने, स्मृतियों ने, महाजनों ने उच्च स्थान दिया हुआ है। अन्यों पर हुकूमत चलाने के लिए उन्हें अधिकार दिए हुए हैं। पूरा हिंदू धर्म, वरिष्ठ वर्ग के हिंदुओं ने, वरिष्ठ वर्ग के हिंदुओं के संवर्धन के लिए रचा हुआ है। यह बात बिल्कुल निर्विवाद सत्य है। जिसे वे धर्म कहते हैं, उस धर्म में आपको उन्होंने गुलाम की भूमिका दी हुई है। इतना ही नहीं, ऐसी व्यवस्था उन्होंने कर रखी है कि इस गुलामी से कभी आप मुक्त न हो पाएं। इसीलिए, हिंदू धर्म की इस बौद्धि क गुलामी से छुटकारा पाने की जितनी आप लोगों को जरूरत है, उतनी उन लोगों को नहीं है। इस तरह हिंदू धर्म आपको दो तरह से मारक सिद्ध हुआ है। इस धर्म ने आपकी मानसिक आजादी छीन कर, आपको गुलाम बनाया हुआ है और इसी धर्म ने व्यवहार में आपको गुलामी की बदतर हालत में लाकर पटक दिया है। आप अगर आजादी चाहते हैं तो बेशक आपको धर्म परिवर्तन ही करना होगा।