89. ‘मुक्ति कोन पथे?’ - मई 1936 दादर (मुंबई) - Page 507

490 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

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आज जो अस्पृश्यता निवारण का आंदोलन चलाया जा रहा है, उस पर टिप्पणी की जाती है कि अस्पृश्यों में जो विभिन्न जातियां हैं, उनमें भी आपसी व्यवहार में जातिभेद किया जाता है। महार-मांग एक-दूसरे का छुआ, एक-दूसरे के हाथ का पका भोजन खाते नहीं हैं। इन दोनों जातियों के लोग भंगी जाति के लोगों को छूते नहीं। उनके साथ अस्पृश्यता का पालन करते हैं। आपस में जाति भेद और अस्पृश्यता का पालन करने वाले लोगों को उच्च जातियों को यह कहने का अधिकार कैसे पहुंचता है कि वे जातिभेद को छोड़ दे? अस्पृश्यता को न मानें? पहले आप अपना आपसी जातिभेद का, अस्पृश्यता का निवारण करो और फिर हमारे पास न्याय मांगने के लिए आना। इस तरह की ढोंगी, शातिर सलाह उन्हें दी जाती है। इसकी जड़ में जो बात है, वह सच ही है, यह हमें मानना पडे़गा। हालांकि इस सलाह की आड़ में किया जा रहा आरोप गलत है। अस्पृश्य वर्ग के लोग कुछ जातिभेद और अस्पृश्यता का पालन करते हैं, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता। इन बातों को मानना ही पडे़गा, लेकिन इस अपराध के लिए वे

खुद जिम्मेदार हैं, यह कहना बिल्कुल झूठ होगा। जातिभेद और अस्पृश्यता का जन्म अस्पृश्य लोगों के द्वारा नहीं हुआ। जातिभेद और अस्पृश्यता का जन्म उच्च जाति के हिंदुओं के कारण हुआ है। जातिभेद और अस्पृश्यता की नींव उन्होंने रखी है। जातिभेद और अस्पृश्यता का पालन करने का पाठ उच्च जाति के हिंदुओं ने पढ़ाया है। यह बात अगर सच है, तो जातिभेद और अस्पृश्यता की रूढि़ की जिम्मेदारी स्पृश्य वर्ग की है, अस्पृश्य वर्ग की नहीं। अस्पृष्य लोग जातिभेद और अस्पृश्यता का पालन करते हुए उच्च वर्ग के सिखाए पाठ को बस दोहरा रहे हैं। अगर यह पाठ झूठ के बल पर खड़ा है, तो इस पाप की जिम्मेदारी उन पर जाती है, जिन्होंने यह पाठ सिखाया। जिन्होंने यह पाठ दोहराया, वे इस पाप के जिम्मेदार नहीं हो सकते। यह जवाब अगर सही भी है, तब भी मैं इससे संतुष्ट नहीं हो सकता। जिन कारणों से अस्पृश्यता और जातिभेद हमारे बीच आया, उस कारण के लिए भले हम जिम्मेदार न हों, फिर भी हमारे बीच जो जातिभेद और अस्पृष्यता पल रही है उसका निषेध न करना, उसे उसी रूप में चलने देना, हमारे लिए हितावह नहीं है। अस्पृश्यता और जातिभेद की शुरुआत के लिए भले हम जिम्मेदार न हों, लेकिन उसे नष्ट करने की जिम्मेदारी हमारे ऊपर है। यह जिम्मेदारी हम सब लोगों ने पहचानी है और इस बात पर मुझे गर्व है। मुझे अभिमान है कि महार जाति में ऐसा कोई नेता नहीं, जो यह कहता हो कि जातिभेद का पालन करो। अगर तुलना करनी हो तो वह नेताओं में ही करनी होगी। महारों में से पढे़-लिखे वर्ग और ब्राह्मणों में से पढे़-लिखे वर्ग के बारे में तुलना करें, तो अस्पृश्य वर्ग का शिक्षित वर्ग जातिभेद खत्म करने के लिए