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ज्यादा अनुकूल है, इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता। इतना ही नहीं यह बात कृति से भी सिद्ध की जा सकती है। महारों का शिक्षित वर्ग इस सुधार के लिए अनुकूल है, इतना ही नहीं महारों की अनपढ़ जनता भी इसके लिए अनुकूल है, यह साबित किया जा सकता है। आज महारों में ऐसा एक भी व्यक्ति नहीं मिलेगा, जो महार और मांगों के बीच के रोटी-बेटी व्यवहार के खिलाफ हो। आपसी जातिभेद को नष्ट करने की अहमियत आप जानते हैं, इसका मुझे संतोष है। मैं आपको इसके लिए बधाई देता हूं। लेकिन क्या कभी आपने इस बात के बारे में सोचा है कि अस्पृश्यों के बीच व्याप्त जातिभेद को कैसे नष्ट किया जा सकता है? सहभोजन करने से या कभी-कभार सहविवाह करने से जातिभेद नष्ट नहीं होता। जातिभेद एक मानसिक स्थिति है, एक मानसिक व्यथा है। इस मानसिक व्यथा का जन्म हिंदू धर्म की सीख के कारण होता है। हम जातिभेद का पालन इसलिए करते हैं, क्योंकि हम जिस धर्म का पालन जिस धर्म में जी रहे हैं, करते हैं, वह धर्म हमें ऐसा करने के लिए कहता है। अगर कोई चीज कड़वी हो तो उसे मीठी बनाया जा सकता है, नमकीन, कसैली हो तो उसका स्वाद बदला जा सकता है लेकिन विष का अमृत नहीं बनाया जा सकता। हिंदू धर्म में रहते हुए, जातिभेद को नष्ट करेंगे, कहना लगभग विष को अमृत बनाने की बात कहने जैसा ही है।
अर्थात, जिस धर्म में इंसान को इंसान से घिन करने की सीख दी जाती है उस धर्म में हम जब तक हैं तब तक हमारे मन में व्याप्त जातिभेद की भावनाएं कभी भी नष्ट नहीं होंगी। अस्पृश्यों में व्याप्त जातिभेद और अस्पृश्यता नष्ट करनी हो तो उन्हें धर्म परिवर्तन ही करना पडे़गा।
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अब तक मैंने आपके सामने धर्म परिवर्तन की कारण मीमांसा रखी है। मुझे उम्मीद है कि वह आपको सोचने के लिए उद्यत करेगी। जिनको यह कारण मीमांसा गहरी और कठिन लगी हो, उनके लिए इस विषय को जानना आसान हो, इसके लिए मैं कुछ सीधे साधे विषय आपके सामने रखने जा रहा हूं। इस धर्म परिवर्तन की बात में नया क्या है? सच पूछो तो हिंदू और आपका सामाजिक संबंध क्या है? मुसलमान लोग जितना हिंदुओं से अलग हैं, उतने ही आप हिंदुओं से अलग हैं। ईसाई समाज जितना हिंदू समाज से अलग है, उतने ही आप भी हिंदू समाज से भिन्न हैं। ईसाई और मुसलममान लोगों से जिस तरह हिंदुओं का रोटी-बेटी व्यवहार नहीं होता, उस तरह आपका भी नहीं होता। आपका और हिंदुओं का समाज आज भी अलग-अलग हैं, दो समाज हैं। धर्म परिवर्तन करने के कारण एक समाज के दो टुकडे़ हुए, ऐसा कोई नहीं कह सकता, और ऐसा किसी को लगेगा भी नहीं। आज आप लोग जिस