7. जागृति की ज्योत को कभी भी बुझने न दें - मार्च 1927 कोलाबा - Page 52

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पैसा खर्च करना पड़ा होगा इसका विचार किया जाना चाहिए। इस बारे में दो राय नहीं हो सकती कि ज्ञान की यह जिज्ञासा उस समय के समाज के लिए भ्रमण की तरह थी, इसमें कोई दो राय नहीं। यह भी कहा जा सकता है कि उस समय के लोगों ने अपने ज्ञान का उचित ढंग से उपयोग किया। सार्वजनिक क्षेत्र में काम करने वाले लोगों का वर्गीकरण करें तो यह दिखाई देगा कि कुछ लोग - नाम के लिए - तो कुछ लोग - काम के लिए - इस क्षेत्र में आते हैं। इनमें - नाम के लिए - आने वालों की तादाद ही ज्यादा होती है। पूना के लोग कहते है कि अस्पृश्यों में आई जागृति के मूल निर्माता हम ही हैं। मुंबई में भी कई लोकप्रिय लोग हैं जो इसका श्रेय लेते हैं। डिप्रस्ड क्लाकेस मिशन सोसायटी, भारतीय निराश्रित साह्यकारी मंडल वालों का कहना है कि अस्पृश्यों में जागृति हमारे कारण शुरू हुई। जो लोग इस तरह से सम्मान मांगते हैं उनके बारे में यही कहना पड़ेगा कि उन्हें अस्पृश्य आंदोलन का सही इतिहास पता नहीं है। शोध करने पर यह पता चलेगा कि मुंबई क्षेत्र में अस्पृश्य समाज में काम करने के लिए जो संस्थाएं शुरू हुईं उनमें - अनार्य दोष परिहारक मंडल-पहली संस्था थी। 1893 में जब सेना में अस्पृश्यों की भर्ती पर पाबंदी लगाई गई तो उस समय इस संस्था ने प.वा. महादेव गोविंद रानडे की सहायता से सरकार को एक अर्जी दी थी। इससे स्पष्ट है कि इस संस्था का संपर्क बड़े-बड़े लोगों से था। 1897 में इस संस्था ने कांग्रेस को एक प्रश्नावली भेजी थी उसमें दलील दी गई थी कि आपको समाज सुधार किए बगैर राजनीतिक सुधारों की मांग करने का क्या अधिकार है। इससे दिखाई देता है कि संस्था में कितना जोश था। 1898 में जब सर हरबर्ट रिसले साहब ने भारतीय लोगों के रीती-रिवाज़ों का संकलन करना शुरू किया था तो उन्होंने एक प्रश्नसूची इस संस्था को भी भेजी थी। इससे स्पष्ट है कि संस्था इतनी महत्वपूर्ण हो गई थी कि सरकार भी उससे सलाह-मशवरा करने लगी थी। यह मैं सबूतों के आधार पर कह रहा हूं। इस संस्था के सारे कागजात अब मेरे पास हैं। इस संस्था की स्थापना रत्नागिरी जिले के दापोली में हुई थी। इससे यह स्पष्ट है कि सबसे पहले अस्पृश्योन्नति का आंदोलन शुरू करने का श्रेय किसी को दिया जा सकता है तो इस संस्था और इस क्षेत्र को देना होगा। इस संस्था के नेताओं ने केवल समस्याएं दूर करने का काम किया ऐसा नहीं है। लेखन के द्वारा जागृति का भी काफी काम किया। सत्यशोधक समाज के प्रणेता जोतिबा फुले के कई सच्चे साथी और उत्साही शिष्यों में से बहुत से इस संस्था के संचालकों में से थे। एक नाम का उल्लेख किए बगैर मुझसे रहा नहीं जा रहा। यह व्यक्ति हैं कै. गोपालबुवा वलंगकर। उन्होंने अपने लेखन के द्वारा जो जागृति की वह असामान्य है। जिन्हें इसके बारे में जानना है उन्हें - दीनबंधु - के पुराने अंक देखने चाहिए तो पता चलेगा।