89. ‘मुक्ति कोन पथे?’ - मई 1936 दादर (मुंबई) - Page 510

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कर नहीं चलेगा। क्योंकि उस नाम के उच्चारण के कारण कोई पास नहीं आएगा। मैं आपसे पूछता हूं कि, ऐसी बीच में मध्यमा स्थिति में लटके रहने के बजाय, आज एक नाम, कल दूसरा नाम लेकर नामांतरण करते रहने से बेहतर धर्म परिवर्तन के साथ हमेशा के लिए आप नामांतरण क्यों नहीं करते?

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धर्म परिवर्तन का आंदोलन शुरू होने के समय से ही कई लोगों ने इस आंदोलन के खिलाफ कई आरोप लगाए हैं। इन आरोपों में कितने सच हैं, इस बारे में सोचना जरूरी है। कुछ हिंदू लोग धार्मिकता की आड़ लेकर आपसे कह रहे हैं कि- धर्म कोई उपभोग की वस्तु नहीं है! हम जिस तरह एक दिन एक कोट पहनते हैं, दूसरे दिन दूसरा कोट पहनते हैं, उस तरह धर्म बदलना संभव नहीं है! हिंदू धर्म को झटक कर अगर आप पराए धर्म में चले जाते हैं, तो सोचिए, आपके जो पुरखे इतने समय तक हिंदू रहे वे क्या मूर्ख थे? - कुछ सयाने लोगों ने यह सवाल पैदा किया है। मेरी नजर में इस आरोप में कोई दम नहीं है। केवल पुरखों का धर्म है, इसीलिए किसी धर्म से चिपके रहना किसी मूर्ख को ही शोभा देगा। कोई भी सयाना आदमी इस तरह की भूमिका स्वीकार नहीं कर सकता। कहना पडे़गा कि, केवल अपने पुरखों का है, इसीलिए धर्म परिवर्तन ना करें कहने वालों ने, शायद इतिहास नहीं पढ़ा है। पहले जो आर्यों का धर्म था, जिसे वैदिक धर्म कहा जाता है वह मुख्यतः गोमांस भक्षण करना, शराब पीना, स्वैर वर्तन, इन तीन बातों में समाया हुआ था। हजारों सालों तक भारत के लोगों ने इस धर्म का पालन किया। आज भी कुछ ब्राह्मणों में उस धर्म की ओर जाने की ललक जगती है। केवल पुरखों के धर्म का ही पालन करना हो तो, भारत के लोगों ने वैदिक धर्म छोड़ कर बौद्ध धर्म क्यों स्वीकार किया? वैदिक धर्म छोड़ कर उन्होंने जैन धर्म को स्वीकार क्यों किया? हमारे पूर्वज इस धर्म में रहे यह बात सच है, लेकिन वे अपनी खुशी से रहे, संतोष के साथ रहे, यह मैं नहीं कह सकता। इस देश में लंबे समय तक चातुर्वर्ण्य की व्यवस्था लागू थी। इस चातुर्वर्ण्य के ब्राह्मण शिक्षा लेते, क्षत्रीय लोग लडाइयां लडते, वैश्य रुपया कमाते और शूद्र सबकी सेवा करते और इस तरह के नियमों में बंधी जिंदगी चलती रही। इस तरह की जिंदगी में शूद्रों के पास विद्या नहीं थी, धन नहीं था, शस्त्रास्त्र भी नहीं थे। ऐसी विपन्न और निःशस्त्र स्थिति में आपके पुरखों को जीना पड़ा। उन्होंने यह धर्म संतोष के साथ स्वीकार किया, ऐसा कोई भी सयाना आदमी नहीं कह सकता। आपके पूर्वजों को ऐसे धर्म के खिलाफ विद्रोह करना क्या संभव हो पाता? इस बारे में सोचा जाना चाहिए। विद्रोह करना संभव होते हुए भी अगर वे विद्रोह किए बिना इस धर्म में बने रहते तो कहा जा सकता है कि उन्होंने यह धर्म खुद संतोष के साथ स्वीकारा था। लेकिन वस्तविकता देखें तो पता चलता है कि वे निरुपाय थे।