89. ‘मुक्ति कोन पथे?’ - मई 1936 दादर (मुंबई) - Page 511

494 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

इसीलिए उन्हें इस धर्म में रहना पड़ा, यह निर्विवाद सत्य है। इस दृष्टि से देखा जाए तो, हिंदू धर्म हमारे पूर्वजों का धर्म न होकर उन पर जबरदस्ती लादी गई गुलामी थी, ऐसा कहा जा सकता है। उस गुलामी से अपने आपको मुक्त कराने के साधन उनके पास नहीं थे। इसीलिए उस गुलामी के खिलाफ वे जंग नहीं पुकार सके। उन्हें गुलामी में ही रहना पड़ा। और इसके लिए उन्हें कोई दोष नहीं दे सकता। किसी के भी मन में उनके बारे में दया भाव ही उत्पन्न होगा। लेकिन आजकल की पीढ़ी पर इस तरह की जबरदस्ती कोई नहीं कर सकता। उन्हें हर तरह की आजादी है। इस आजादी का उपयोग करते हुए अगर वे अपने आपको आजाद नहीं करा सकते, तो बडे़ दुःख के साथ कहना पड़ेगा कि उनके जैसा नीच, उनके जैसे अधम, उनके जैसा परोपजीवि और कोई नहीं है।

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पुरखों का धर्म है, केवल इसीलिए उससे चिपके रहना मूर्खता होगी। कोई भी सयाना आदमी इस तरह नहीं सोचेगा। जिस स्थिति में पैदा हुआ, उसी स्थिति में जीवन बिताने की बात, पशुओं के लिए ठीक होगी, इंसानों के लिए नहीं। इंसान और पशु में यही फर्क है कि वे अपनी उन्नति नहीं कर सकते। इंसान अपनी उन्नति कर सकता है। बदलाव के बगैर उन्नति असंभव है। धर्म परिवर्तन एक तरह का बदलाव है। और अगर धर्म परिवर्तन के बगैर उन्नति कर पाना असंभव हो तो धर्म परिवर्तन करना जरूरी है। केवल अपने बाप-दादों का है, इसलिए धर्म को अपनी उन्नति के आडे़ नहीं आने देना चाहिए।

धर्म परिवर्तन के खिलाफ एक और मुद्दा उठाया जाता है। कुछ लोग यह कहते हैं कि - धर्म परिवर्तन भगोड़ापन है।“ आज हिंदुओं में कई लोग अपने धर्म में सुधार करने के लिए सिद्ध हैं। उनकी सहायता से जातिभेद और अस्पृश्यता नष्ट की जा सकती है। ऐसे हालात में धर्म परिवर्तन करना पूरी तरह गलत है। हिंदू समाज सुधारकों के बारे में बाकी लोगों का जो भी मत रहा हो, मेरे मन में उनके बारे में बेहद नफरत है। मैं उन्हें अच्छी तरह जानता हूं और इन अधकचरे लोगों से मैं बिल्कुल ऊब चुका हूं। जो लोग अपनी जाति में रहना चाहते हैं, अपनी जाति में मरना चाहते हैं, अपनी जाति में शादी करना चाहते हैं, वे कहते हैं कि ‘हम जातिभेद को खत्म करने वाले हैं’ और उनके इस झूठे कथन पर अस्पृश्य लोग विश्वास नहीं करते, इसलिए वे गुस्सा होते हैं, यह बडे़ आश्चर्य की बात है। इन लोगों की भोंडी बातों सुनता हूं, तो अमेरिका में निग्रो लोगों को मुक्त करने के लिए जिन गोरे अमेरिकन लोगों ने कोशिश की थी, उनकी मुझे याद आती है! किसी जमाने में अमेरिका के निग्रो लोगों की हालत भारत के अस्पृश्य लोगों की तरह ही थी। फर्क सिर्फ