89. ‘मुक्ति कोन पथे?’ - मई 1936 दादर (मुंबई) - Page 512

495

इतना ही था कि उनकी गुलामी कानून ने प्रस्थापित की थी और आपकी गुलामी धर्म ने प्रस्थापित की है। इस गुलामी से उन्हें छुटकारा दिलाने के लिए अमेरिका के कुछ सुधारक कोशिश कर रहे थे। लेकिन क्या हम, हिंदू समाज सुधारकों की और अमेरिका के निग्रो लोगों को गुलामी से छुटकारा दिलाने वाले सुधारकों की आपस में तुलना कर सकते हैं? काले हब्शी लोगों को गुलामी से छुटकारा दिलाने के लिए अपने ही रक्तमांस के गोरों के साथ अमेरिकन सुधारवादियों को तगड़ी लड़ाई लड़नी पड़ी। उन्हें गुलामी में रखना चाहिए, कहने वाले कई गोरों की उन्होंने जानें लीं, इस कोशिश में अपने कई लोगों की जानें गंवाईं। उन प्रसंगों के वर्णन जब इतिहास में पढ़ते हैं, और हमारे समाज सुधारकों के चित्र आंखों के सामने लातें हैं तब कहना पड़ता है, ”कहां राजा भोज और कहां गंगू तेली!“ अपने आपको सुधारक कहलाने वाले भारत के अस्पृश्यों के मददगारों से पूछने का मन होता है कि अमेरिका के गोरों ने निग्रों के छुटकारे के लिए जो आपस में ही गृह युद्ध किया था, वैसा मुकाबला करने के लिए क्या आप सिद्ध हैं? अगर आप तैयार नहीं हैं, तो सुधार की खोखली बातें करने में क्या धरा है? हिंदुओं में अस्पृश्यों के लिए लड़ने वाले सबसे बडे़ व्यक्ति हैं गांधी! उनकी सोच और पहुंच कहां तक है? अंग्रेज सरकार के खिलाफ निःशस्त्र प्रतिकार की लड़ाई लड़ने वाले गांधी अस्पृश्य लोगों पर जुल्म करने वाले हिंदुओं का मन दुखाने के लिए तक तैयार नहीं हैं! उनके खिलाफ सत्याग्रह करने के लिए तक तैयार नहीं हैं! इतना ही नहीं उनके खिलाफ कानूनी इलाज करने के लिए भी तैयार नहीं हैं! इन सुधारकों की उपादेयता क्या है, मैं समझ नहीं पा रहा हूं।

v ly
xy r
y ¨x
d h

असल में गलती स्पृश्य लोगों की है

कुछ लोग अस्पृश्यों की सभाओं में आकर स्पृश्यों को बड़े ही जोश के साथ गालियां देंगे। कुछ लोग अस्पृश्यों की सभा में आकर बडी अकड़ के साथ, अस्पृश्यों से कहेंगे कि भाइयों, आप साफ-सुथरे रहें, शिक्षित हों जाइए, अपने पैरों पर खडे़ रहें, आदि-आदि। सच कहें तो अगर कोई आरोपी है तो यहां स्पृश्य वर्ग ही आरोपी है। गलती स्पृश्य वर्ग से ही हो रही है। लेकिन कोई स्पृश्य वर्ग की सभा लेकर उन्हें दो-चार बातें समझाएंगे? बिल्कुल नहीं। हिंदू धर्म में रहते हुए ही आप अपनी लड़ाई जारी रखें, हम-आप मिल कर उसे जारी रखेंगे कहने वाले सुधारकों को मुझे दो बातों की याद दिलाना जरूरी लगता है। बीते महायुद्ध में, एक अमेरिकन और एक अंग्रेजी आदमी के बीच हुआ वार्तालाप मैंने पढ़ा था, वह काफी बोधप्रद होने के नाते यहां उसका जिक्र करना मुझे उचित लगता है। उनकी बातचीत का विषय था, लड़ाई कब तक जारी रखी जाए। उस अमेरिकी आदमी के प्रश्न का जवाब देते हुए