89. ‘मुक्ति कोन पथे?’ - मई 1936 दादर (मुंबई) - Page 513

496 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

अंग्रेज आदमी ने अकड़कर कहा था, ”आखिरी फ्रेंच आदमी मारा जाने तक हम यह लड़ाई लड़ेंगे!“ हिंदू समाज सुधारक जब कहते हैं, कि अस्पृश्यता की लड़ाई हम आखिर तक लड़ेंगे, ‘तब आखरी अस्पृश्य मारे जाने तक लड़ेंगे। कम से कम उसका यही मतलब मेरी समझ में आया है। किसी और का सिर हथेली पर लेकर युद्ध क्षेत्र में उतरने वालों पर हमें कितना भरोसा करना होगा इस बारे में फैसला करना आपके लिए भी मुश्किल नहीं है। हमारी लड़ाई में अगर हमीं मरने वाले हैं तो फिर बेकार की जगह लड़ाई छेड़ने का मतलब ही क्या है! हमारा उद्देश्य हिंदू समाज में सुधार लाना नहीं है। असल में, वह हमारा काम भी नहीं है। अपनी आजादी प्राप्त करना हमारा उद्देश्य है। इसके अलावा हमें और कुछ करना नहीं है। धर्म परिवर्तन से अगर हमें आजादी मिलती हो तो हिंदू समाज की लड़ाई में हम अपनी गर्दन क्यों फंसाएं? उस लड़ाई में अपनी ताकत/सामर्थ्य की, शक्ति और धन की आहुति क्यों दें? कोई यह गलतफहमी कŸाई न पालें कि हिंदू समाज में सुधार लाना यही अस्पृश्यता निवारण आंदोलन का मुख्य उद्देश्य है। अस्पृश्यता निवारण आंदोलन का प्रमुख उद्देश्य अस्पृश्यों को सामाजिक आजादी उपलब्ध करा देना ही है। और यह भी सच है कि यह आजादी धर्म परिवर्तन के बगैर उन्हें मिलने वाली नहीं है। अस्पृश्यों को समाज में समता का स्थान पाना है। मैं यह बात मानता हूं। सचमुच समता की प्राप्ति यह उनके आंदोलन का एक उद्देश्य है। लेकिन उस समता को पाने के लिए उन्हें हिंदू धर्म में ही रहना चाहिए, वरना उन्हें समता मिलेगी नहीं, ऐसा कोई कह नहीं सकता। समता प्राप्त करने के दो रास्ते मुझे दिखाई देते हैं, हिंदू धर्म में रह कर समता प्राप्त करना या फिर धर्म परिवर्तन कर समता प्राप्त करना। हिंदू धर्म में रह कर समता प्राप्त करनी हो तो केवल छुआछूत से पिंड छुड़ा कर काम नहीं बन सकता। रोटी-बेटी व्यवहार हुआ तो ही समानता प्राप्त हो सकती है। इसका मतलब यही है कि चातुर्वर्ण्य व्यवस्था खत्म हो जानी चाहिए। और ब्राह्मण धर्म का खात्मा हो जाना चाहिए। क्या यह बात संभव है? अगर संभव नहीं हो तो हिंदू धर्म में रहते हुए समता की उम्मीद करना क्या सही होगा? इस कोशिश में क्या आप सफलता पाएंगे? उस तुलना में धर्म परिवर्तन का रास्ता बहुत आसान है। हिंदू समाज, मुसलमान समाज के साथ समानता से पेश आता है। हिंदू समाज, ईसाई समाज के साथ समानता से पेश आता है। यानी कि, धर्म परिवर्तन से बड़ी सहजता से सामाजिक समता प्राप्त हो सकती है। अगर यह सच है तो फिर आप धर्म परिवर्तन जैसे आसान तरीके क्यों नहीं अपनाते हैं? मेरे मत में धर्म परिवर्तन का उपाय अस्पृश्यों की तरह हिंदुओं के लिए भी सुखावह होने वाला है। हिंदू धर्म में रहेंगे, तब तक आपको उनके साथ छुआछूत के लिए, पानी के लिए, रोटी के लिए, बेटी के लिए संघर्ष करते, झगड़ते रहना पड़ेगा। जब तक यह संघर्ष जारी रहेगा, तब तक आपमें और उनमें यह बखेड़ा जारी रहेगा। आप एक-दूसरे के दुश्मन बने रहेंगे। धर्म परिवर्तन किया तो कलह की जड़ ही मिट