89. ‘मुक्ति कोन पथे?’ - मई 1936 दादर (मुंबई) - Page 514

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जाएगी। आपको उनके मंदिरों पर हक बताने का अधिकार नहीं रहेगा और जरूरत भी नहीं रहेगी। सहभोजन कीजिए, सहविवाह कीजिए आदि सामाजिक अधिकार के लिए संघर्ष की वजह ही खत्म हो जाएगी। ये झगड़े मिटेंगे, तो आपस में भाईचारा बढे़गा, आपस में प्रेम पैदा होगा। आज मुसलमान और ईसाई समाज के साथ हिंदुओं के कैसे संबंध हैं, देखिए। आपकी तरह हिंदू लोग मुसलमान या ईसाई लोगों को भी अपने मंदिरों में आने नहीं देते। आपकी ही तरह उनके साथ भी रोटी-बेटी व्यवहार नहीं करते। इसके बावजूद उनमें और हिंदुओं के बीच जो भाईचारा है, वह आप के और हिंदुओं के बीच नहीं है। इस फर्क का कारण यही है, कि हिंदू धर्म में रहने के कारण हिंदू समाज के साथ सामाजिक और धार्मिक अधिकारों के लिए आपको संघर्ष करना पड़ता है। लेकिन हिंदू धर्म से बाहर जाने के कारण उन्हें हिंदुओं के साथ धार्मिक और सामाजिक अधिकारों के लिए झगड़ना नहीं पड़ता। दूसरी बात यह है कि हिंदू समाज में उन्हें किसी भी तरह के सामाजिक अधिकार न होते हुए भी, यानी कि उनके साथ किसी भी तरह रोटी या बेटी व्यवहार नहीं होते हुए भी हिंदू समाज उनके साथ असमान व्यवहार नहीं करता। धर्म परिवर्तन से अगर समानता प्राप्त होती है, धर्म परिवर्तन से अगर हिंदू और अस्पृश्य के बीच भाईचारा पैदा हो सकता है, तो फिर समता प्राप्त करने का यह सीधा-सादा और आसान उपाय अस्पृश्य लोगों से क्यों न स्वीकारा जाए? इस तरह से देखा जाए तो धर्म परिवर्तन का यह मार्ग सही मायनों में आजादी दिलाने वाला है। इस पर चल कर हम सही मायनों में समता पा सकते हैं। धर्म परिवर्तन का मार्ग भगोडे़पन का मार्ग नहीं है। वह डरपोक तरीका भी नहीं है। वह एक अक्लमंदी का रास्ता है। धर्म परिवर्तन के खिलाफ एक और मुद्दा उठाया जाता है। कुछ हिंदू लोगों का कहना है कि जातिभेद से परेशान होकर धर्म परिवर्तन करने में कुछ नहीं धरा है। हिंदू लोग बताते हैं, आप कहीं भी जाइए, जातिभेद हैं, मुसलमानों में जातिभेद हैं, ईसाइयों में जातिभेद हैं। दुर्भाग्य से इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि हिंदू धर्म के अलावा भारत के अन्य धर्मों में भी जातिभेद ने जडें जमाई हैं। लेकिन इस पाप के धनी हिंदू लोग ही हैं। उन्हीं के जरिए यह रोग फैला है और बाकी लोग भी इसके शिकार हुए हैं। उनकी दृष्टि से इसका कोई इलाज नहीं है। ईसाई और मुसलमानों में जो जातिभेद है, वह हिंदुओं जैसा ही है, यह कहना गलत होगा। हिंदुओं के जातिभेद और मुसलमान और ईसाइयों के बीच के जातिभेद में बहुत फर्क है। पहले इस बात को ध्यान में लेना जरूरी है कि मुसलमान और ईसाइयों में अगर जातिभेद है भी तो वह उस समाज का प्रमुख अंग नहीं है। ‘ तुम कौन हो? ’ इस सवाल के लिए जब कोई ‘मैं मुसलमान हूं,’ या ‘मैं ईसाई हूं’, यह जवाब देता है तो पूछने वाले की जिज्ञासा शांत होती है। लेकिन अगर उसने, ‘मैं हिंदू हूं,’ यह जवाब दिया तो किसी को संतोष नहीं हो सकता। तुरंत पूछा जाता है, ‘तुम्हारी जात क्या है?’ और इस सवाल का जवाब पाए