89. ‘मुक्ति कोन पथे?’ - मई 1936 दादर (मुंबई) - Page 515

498 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

बगैर उसकी स्थिति का सही अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। इससे पता चलता है कि हिंदू धर्म में जाति को कितना महत्व दिया गया है, और मुसलमान और ईसाई धर्म को कितना गौण स्थान प्राप्त है। ऊपर दिए गए उदाहरण से यह मुद्दा अपने आप साबित हो जाता है। इसके अलावा हिंदुओं के जातिभेद तथा मुसलमान और ईसाइयों के बीच के जातिभेद में और भी एक महत्वपूर्ण फर्क है। हिंदुओं के जातिभेद की जड़ में उनका धर्म है। मुसलमान और ईसाइयों के जातिभेद की जड़ में उनके धर्म का अधिष्ठान नहीं है। हिंदू अगर कहें कि हम जातिभेद नष्ट करेंगे तो उनका धर्म उनके आडे़ आएगा, लेकिन मुसलमान और ईसाई अगर कहें कि हम जातिभेद को नष्ट करेंगे तो उनके इस इरादे के बीच उनका धर्म आडे़ नहीं आएगा। इतना ही नहीं ऐसे काम में हो सकता है उन्हें अपने धर्म से बड़ी मदद मिल सकती है। समर्थन प्राप्त हो सकता है। जातिभेद सर्वत्र है, यह अगर मान भी लिया जाए, तो उसका निष्कर्ष यह कŸाई नहीं निकलता कि हमें हिंदू धर्म में ही रहना है। जातिभेद अगर अनिष्ट है, तो हमें यह मानना होगा कि जिस समाज में जाने से जातिभेद की तीव्रता कम भोगनी पडे़गी अथवा जिस धर्म में जाने से जातिभ्ेद को जल्द से जल्द, आसानी से और सहजता से मिटाया जा सकेगा, उस समाज में जाना चाहिए, यही सही और तर्क पर खरा उतरने वाला सिद्धांत है।

‘केवल धर्म परिवर्तन से क्या होगा? आप अपनी धार्मिक और शैक्षणिक स्थिति में सुधार लाने की कोशिश कीजिए’, कुछ हिंदू लोग ऐसा भी बताते हैं। इस सवाल के कारण हममें से कुछ लोग दुविधा में पड़ सकते हैं। इसीलिए इस बारे में सोचना जरूरी है, ऐसा मुझे लगता है। पहले यह सोचना होगा कि, आपकी आर्थिक और शैक्षणिक हालत में सुधार लाने की कोशिश कौन करेगा? आप? या फिर आपको जो इस तरह का उपदेश देते हैं वे लोग? जो हिंदू लोग आपको इस तरह का उपदेश देते हैं, वे बोलने के अलावा और कुछ करेंगे, ऐसा नहीं लगता, करने की उनकी कोई तैयारी भी देखने में नहीं आई है। उल्टे, अपनी जाति के प्रति जागरुक रह कर, अपनी जाति की आर्थिक हालत सुधारने में हिंदू लोग लगे हुए हैं। ब्राह्मण लोग ब्राह्मण औरतों के लिए प्रसूतिगृह, ब्राह्मण बच्चों के लिए स्कॉलरशिप, ब्राह्मण बेकारों को नौकरी दिलाना आदि कामों में लगे हुए हैं। सारस्वत भी यही कर रहे हैं। कायस्थ, मराठे यही करने में लगे हुए हैं। ‘हर कोई अपने लिए और जिसका कोई नहीं उसका खुदा’, ऐसी हालत यहां है। आपको अपनी उन्नति खुद हासिल करनी होगी। कोई और आपकी मदद नहीं करेगा। अगर सही स्थिति ऐसी है, तो इन लोगों की ओर ध्यान देकर क्या हासिल होगा? केवल दिग्भ्रमित कर समय गंवाने के अलावा इसका और कोई मतलब नहीं हो सकता। अगर आपको खुद अपनी हालत में सुधार करना हो, तो फिर हिंदू लोगों के कथनों पर ध्यान देने की कोई जरूरत