89. ‘मुक्ति कोन पथे?’ - मई 1936 दादर (मुंबई) - Page 516

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नहीं है। असल में उपदेश देने का उन्हें कोई अधिकार भी नहीं है। तथापि, इतना ही कह कर इस सवाल को मैं यूं ही छोड़ नहीं देना चाहता। इसका खंडन करना मुझे आवश्यक लगता है।

जो हिंदू लोग यह पूछते हैं कि ‘केवल धर्मांतरण से क्या होगा?’ उनकी विचारशून्यता पर मुझे बड़ा अचरज होता है। भारत के सिक्ख, मुसलमान और ईसाई लोग पहले सब हिंदू ही थे, और उनमें से ज्यादातर शूद्र और अस्पृश्य थे। जिन हिदू लोगों ने हिंदू धर्म छोड़ कर सिक्ख धर्म अपनाया, ईसाई धर्म अपनाया उनकी कोई उन्नति नहीं हुई, क्या ऐसा इन लोगों का कहना है? अगर उनका कहना सच नहीं हुआ, धर्म परिवर्तन से उसकी उन्नति हुई है यह अगर मानना पडे़ तो धर्म परिवर्तन से अस्पृश्यों की उन्नति नहीं होगी, कहने में कितनी सच्चाई हो सकती है, इसके बारे में वे खुद सोचें। धर्म परिवर्तन से कुछ नहीं होगा, कहने वालों का मतलब शायद यही होता है कि धर्म बेकार की चीज है। यह मेरी समझ में नहीं आता कि लोग यह कहते हैं कि, धर्म बेकार की चीज है, उससे न कोई लाभ होता है न कोई नुकसान होता है, वे इस बात का आग्रह क्यों कर रहे हैं कि अस्पृश्य लोग हिंदू धर्म में ही रहें। धर्म ही बेमतलब की चीज है, मानने वाले इस बारे में क्यों माथापच्ची करें कि कोई किसी धर्म में रहे या उस धर्म को छोड़ कर चला जाए? केवल धर्म परिवर्तन से क्या होगा ऐसा जो हिंदू लोग पूछते हैं उनसे मैं पूछना चाहता हूं कि केवल स्वराज्य से क्या होगा? भारत के लोगों की भी अस्पृश्य लोगों की तरह ही आर्थिक और शैक्षणि् ाक प्रगति होना जरूरी अगर है, तो फिर केवल स्वराज से क्या फायदा? और यदि केवल स्वराज से देश का फायदा होता हो तो धर्म परिवर्तन से भी अस्पृश्यों का फायदा होना ही चाहिए। गहरे सोच-विचार के बाद सबको यह मानना ही पडे़गा कि स्वराज की जितनी आवश्यकता देश को है, उतनी ही धर्म परिवर्तन की अस्पृश्यों को आवश्यकता है। देश को जितना स्वराज का महत्त्व है, उतना ही अस्पृश्यों के लिए धर्म परिवर्तन का महत्व है। धर्मांतरण और स्वराज इन दोनों का अंतिम उद्देश्य एक ही है। उनके अंतिम उद्देश्य में किसी तरह का कोई भेदभाव नहीं। वह अंतिम उद्देश्य है, स्वतंत्रता की प्राप्ति। आजादी अगर मनुष्य मात्र के जीवन के लिए आवश्यक है, तो जिस धर्म परिवर्तन से अस्पृश्यों को आजाद जिंदगी जीने को मिलेगी वह धर्म परिवर्तन निरर्थक है, ऐसा कोई कह नहीं सकता।

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पहले उन्नति या पहले धर्म परिवर्तन?

यहां इस बात पर विचार करना भी मुझे जरूरी लगता है कि पहले आर्थिक उन्नति के बारे में सोचा जाना चाहिए कि पहले धर्म परिवर्तन के बारे में सोचा जाना चाहिए? आर्थिक उन्नति के बारे में पहले सोचा जाना चाहिए, कहने वालों से मैं असहमत हूं।