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कुछ इस्तेमाल हो, आर्थिक उन्नति के द्वार आपके लिए खुल जाएं तो पहले आपको अपनी अस्पृश्यता से छुटकारा पाना होगा।
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धर्म परिवर्तन के बारे में कुछ आशंकाएं
यहां तक हमने धर्म परिवर्तन के लिए विरोधकों ने कारण दिए हैं, उन पर विचार किया है। अब उन आशंकाओं के निराकरण की मैं कोशिश करता हूं जो धर्म परिवर्तन के बारे में सहानुभूति रखने वालों ने उपस्थित की हैं। पहले यह कि, मैंने सुना है कि, हमारे कई महार बंधुओं को चिंता है कि अगर उन्होंने धर्म परिवर्तन किया तो उनके वतन (महारकी - लगान माफी) का क्या होगा? उच्च वर्ग के धर्म परिवर्तन विरोधियों ने गांव-गांव के महारों के मन में यह डर डाल दिया है कि यदि आपने धर्म परिवर्तन किया तो फिर आपकी महारकी जाएगी। महारकी जाएगी तो खुद मुझे किसी तरह का खेद नहीं होगा यह बात आप सब लोग जानते हैं। महारों को अधोगति तक ले जाने वाली यदि कोई बात हो तो वह है, महारकी। अपना यह मत पिछले दस सालों से मैं लोगों के सामने रखता रहा हूं। जिस दिन महारकी की बेडि़यों से आपको छुटकारा मिलेगा, उस दिन मैं समझूंगा कि आपके उद्धार का मार्ग खुल गया। इसके बावजूद, जिन्हें महारकी चाहिए, उनको मैं आश्वासन देना चाहूंगा कि धर्म परिवर्तन करने से उनकी महारकी को कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा। इस बारे में 1850 के कानून का जिक्र करना होगा। इस कानून की धारा के अनुसार किसी भी आदमी के केवल धर्म परिवर्तन करने से वारिस या मालमŸा के अधिकारों में कोई बाधा नहीं आनी चाहिए। केवल कानूनी प्रावधान से जिन्हें संतोष नहीं होता, वे नगर जिले के हालात पर ध्यान दें। नगर जिले के कई महार ईसाई हो गए हैं। कई घरों में तो हालत यह है कि कुछ लोग ईसाई हो गए हैं और कुछ लोग महार ही रह गए हैं। इसके बावजूद, जो ईसाई हुए हैं, उनका वतन पर से अधिकार खत्म नहीं हुआ है। नगर के महारों से आपको इसका उदाहरण मिल जाएगा। इसीलिए, यह डर कोई न पाले कि धर्म परिवर्तन से महारकी के लिए जोखम पैदा होगा।
दूसरी आशंका राजनीतिक अधिकारों के बारे में है। कई लोगों ने यह आशंका व्यक्त की है कि, धर्म परिवर्तन करने से हमारे अधिकारों का क्या होगा? कोई यह नहीं कह सकता कि, अस्पृश्य वर्ग को मिले राजनीतिक अधिकारों का महत्त्व मैं नहीं पहचानता। ये राजनीतिक अधिकार पाने के लिए मैंने जितनी मेहनत और कोशिशें की हैं, उतनी किसी और ने नहीं की हैं। हालांकि, राजनीतिक अधिकारों पर ज्यादा जोर देना ठीक नहीं, ऐसा मुझे लगता है। जो राजकीय अधिकार दिए गए हैं वे यावच्चंद्रदिवाकरौ की शर्त पर - यानी जब तक सूरज-चंद्र हैं, तब तक नहीं दिए गए हैं। वे कभी ना कभी खत्म होने ही वाले हैं। अंग्रेज सरकार ने न्याय किया था