89. ‘मुक्ति कोन पथे?’ - मई 1936 दादर (मुंबई) - Page 519

502 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

उसमें खुद के दिए राजनीतिक अधिकारों की काल-सीमा बीस साल तय की थी। पुणे करार में इस तरह की काल-सीमा तय नहीं की गई है, लेकिन उसका मतलब उसमें असीम समय दिया गया है, ऐसा कोई नहीं कह सकता। जो लोग राजनीतिक अधिकारों को महत्त्व देते हैं, वे सोचें कि उन अधिकारों के नष्ट होने पर स्थितियां क्या होंगी? जब ये राजनीतिक अधिकार खत्म हो जाएंगे, तब हमें अपनी सामाजिक सामर्थ्य का ही सहारा रहेगा। और ऐसी ताकत/सामर्थ्य अपने पास नहीं है, यह मैं पहले ही कह चुका हूं। और ऐसा सामर्थ्य हमें धर्म परिवर्तन किए बिना नहीं मिल सकता, यह भी मैं ऊपर बता चुका हूं। पास की सोच कर अब चलेगा नहीं। तुरंत मिलने वाले लाभ के कारण शाश्वत हित किस बात में है इस बात पर न सोचना अतीव दुखदायी हो सकता है। ऐसी स्थितियों में शाश्वत लाभ किन बातों में है इसके बारे में सबको सोचना चाहिए। मेरे मत में, शाश्वत हित के नजरिए से देखें तो धर्म परिवर्तन का मार्ग ही सही मार्ग है। उसके लिए अगर राजनीतिक अधिकारों को अगर छोड़ना भी पडे़ तो उससे ज्यादा डरना नहीं चाहिए। धर्म परिवर्तन से राजनीतिक अधिकारों को किसी भी तरह से कोई नुकसान नहीं पहुंचता। धर्म परिवर्तन करने से अपने राजनीतिक अधिकारों को क्यों नुकसान पहुंचे, यह बात मेरी समझ में नहीं आती। आपके जो राजनीतिक अधिकार हैं, वे आप जहां भी जाएं, आपके साथ ही रहेंगे। इस बारे में मुझे किसी भी तरह की कोई आशंका महसूस नहीं होती। आप अगर मुसलमान बनेंगे, तो मुसलमान के तौर पर आपको राजनीतिक अधिकार मिलेंगे। आप ईसाई बनेंगे तो ईसाइयों की तरह आपको राजनीतिक हक मिलेंगे। सिक्ख बनेंगे तो सिक्खों को मिलने वाले राजनीतिक अधिकार आपको मिलेंगे। राजनीतिक अधिकार जनसंख्या पर आधारित हैं। जिस समाज की जनसंख्या बढ़ेगी, उस समाज के राजनीतिक अधिकारों में भी बढ़ोतरी होगी। अगर हम हिंदू समाज छोड़ कर जाएंगे तो हमारी पंद्रह जगहें हिंदू समाज को मिलेंगी ऐसा भ्रम कोई न पालें। हम अगर मुसलमान बनेंगे, तो आज जो मुसलमानों की जगहें हैं, उनमें पंद्रह की बढ़ोतरी होगी। हम अगर ईसाई बनेंगे तो हमारी जगहें ईसाई समाज को मिलने वाली जगहों के साथ जुड़ जाएंगी और उनकी संख्या बढे़गी। कुल मिलाकर बात यही है कि, हम जहां जाएंगे वहां हमारे राजनीतिक अधिकार भी जाएंगे। इसलिए, इस बारे में डरने जैसी कोई बात है ही नहीं। उल्टे अगर हमने धर्म परिवर्तन नहीं किया, और हिंदू धर्म में ही रहे तो क्या हमारे अधिकार हमें मिलेंगे? इस बारे में सोचिए। मान लीजिए, हिंदू लोग यदि अस्पृश्यता को नहीं मानते हैं, और अगर माना जाए तो वह एक गुनाह होगा, इस आशय का एक कानून पास कराते हैं, और इस तरह का कानून बनाने के बाद यदि आपसे पूछते हैं कि ‘हमने आपकी अस्पृश्यता कानूनन मिटा दी है, अब आप अस्पृष्य नहीं रहे। आप गरीब और दरिद्री हैं। दरिद्र जातियों को हमने राजनीतिक अधिकार दिए नहीं हैं, फिर आपको क्यों दें?’ तो इस सवाल