89. ‘मुक्ति कोन पथे?’ - मई 1936 दादर (मुंबई) - Page 521

504 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

है वे लोग धर्म के बारे में ऐहिक तरीके से ना सोचें तो क्या आंखें मूंद कर आकाश की ओर देखते रहें? इन अमीरों के वेदांतों का गरीबों को क्या उपयोग?

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मैं तो आपको साफ-साफ तौर पर यह बताना चाहता हूं कि इंसान धर्म के लिए नहीं बल्कि धर्म इंसान के लिए होता है। इंसानियत पानी हो तो धर्म परिवर्तन करें। संगठन बनाना हो तो धर्मांतरण करें। समता पानी हो तो धर्म परिवर्तन करें। आजादी पानी हो तो धर्म परिवर्तन करें। गृहस्थी में सुख लाना है तो धर्म परिवर्तन करें। जो धर्म आपकी इंसानियत की कीमत नहीं करता उस धर्म में आप क्यों रहते हैं? जो धर्म आपको शिक्षा लेने की इजाजत नहीं देता, उस धर्म में आप क्यों रहते हैं? जो धर्म आपको पानी मिलने नहीं देता, उस धर्म में आप क्यों रहते हैं? जो धर्म आपकी नौकरी के आडे़ आता है, उस धर्म में आप क्यों रहते हैं? जो धर्म कदम-कदम पर आपकी मानहानि करता है उस धर्म में आप क्यों रहते हैं? जिस धर्म में इंसान के साथ इंसानियत से व्यवहार करने की मनाही हो वह धर्म नहीं सीना-जोरी की सजावट है। जिस धर्म में इंसान की इंसानियत को पहचानना अधर्म माना जाता है, वह धर्म नहीं रोग है! जिस धर्म में अमंगल पशु का स्पर्श हो तो चलता है लेकिन इंसान का स्पर्श निषिद्ध है, वह धर्म नहीं पागलपन है। जो धर्म यह बताता है कि समाज का एक वर्ग विद्या सीखने से वंचित रहे, धनसंचय न करे, शस्त्र धारण ना करें वह धर्म नहीं मानव के जीवन की विडंबना है। जो धर्म अनपढ़ों को अनपढ़ रहने की, निर्धनों को निर्धन रहने की सीख देता है, वह धर्म नहीं वह तो सजा है।

धर्म परिवर्तन से संबंधित जो जो सवाल उभरते हैं, उन पर मैंने यथामति ऊहापोह करने की कोशिश की है। इस सवाल के बारे में मेरा विवेचन हो सकता है, थोड़ा लंबा हुआ हो, अधिक विवेचन करने वाला हुआ हो, लेकिन इस सवाल पर सूक्ष्मता से सोचने का फैसला मैंने किया था। धर्म परिवर्तन के बारे में विरोधकों ने जो मुद्दे उपस्थित किए हैं उनका जवाब देना जरूरी था। मेरा मत है कि, धर्म परिवर्तन की घोषणा की सार्थकता पर यकीन होने तक धर्म परिवर्तन ना करें। किसी के मन में किसी तरह की आशंका न रहे, किसी के मन में किसी तरह का शक ना रहे, इसलिए इतनी बारीकी से इस प्रश्न पर मुझे सोचना पड़ा है। मेरे विचार आपको कहां तक सही लगेंगे, मैं कह नहीं सकता। लेकिन आप पूरी तरह से उन्हें समझेंगे, ऐसी मैं आशा करता हूं। जो लोगों को पसंद हो वही बोल कर लोकप्रियता हासिल करना व्यावहारिक बुद्धि वाले आदमी को शोभा देता है। लेकिन यह बात नेता को शोभा नहीं देती, ऐसी मेरी राय है। लोगों का भला किस चीज से होगा यह निर्भीकता से, निडरता से, लोग क्या कहेंगे इसकी परवाह किए बिना कह देता है,