89. ‘मुक्ति कोन पथे?’ - मई 1936 दादर (मुंबई) - Page 522

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उसी को मैं नेता मानता हूं। आपका हित किस में है, यह बताना मेरा कर्त्तव्य है। आपको भले वह पसंद न आए लेकिन फिर भी मुझे वह समझाना तो पडे़गा ही। मैंने अपना कर्तव्य निभाया है। अब मेरे प्रश्न पर निर्णय करना आपका काम है। धर्म परिवर्तन के सवाल को मैंने जानबूझ कर दो हिस्सों में बांटा है। एक हिस्सा है, ‘हिंदू धर्म का त्याग करना है, या हिंदू धर्म में ही रहना है?’ प्रश्न का दूसरा हिस्सा है, ‘अगर हिंदू धर्म का त्याग किया जाए तो किस धर्म को स्वीकार करें, या नए धर्म की स्थापना करें?’ आज हमें सिर्फ पहले सवाल पर निर्णय करना है। इस सवाल पर निर्णय किए बगैर, दूसरे सवाल के बारे में सोचने या उस दिशा में तैयारी करने का कोई मतलब नहीं है। इसलिए पहले सवाल पर जो कुछ तय करना है आज कीजिए। उस पर निर्णय करने के लिए मैं आपको दूसरा मौका नहीं दे पाऊंगा। आज की सभा में आप जो भी तय करेंगे, उसी हिसाब से मैं अगला कार्यक्रम तय करूंगा। आपने अगर धर्म परिवर्तन के खिलाफ निर्णय लिया, तब तो सवाल ही खत्म हुआ। तब मुझे खुद को क्या करना है, इसका मैं खुद निर्णय करूंगा। धर्म परिवर्तन करने का अगर आपने फैसला किया, तो सब मिल कर संगठित तरीके से धर्म परिवर्तन करने का आश्वासन आपको मुझे देना होगा। धर्म परिवर्तन का निश्चय होने के बाद, हर कोई अगर अपनी मर्जी से जिस-तिस धर्म में जाने वाला हो, तो मैं आपके धर्म परिवर्तन के कार्य में नहीं पडूंगा। मेरी इच्छा है कि आप मेरे साथ ही आएं। जिस धर्म में हम लोग जाएंगे, उस धर्म में अपनी उन्नति के लिए, जो-जो कष्ट उठाने पडेंगे, जितनी मेहनत करनी होगी, वह करने के लिए मैं तैयार हूं। लेकिन, मैं कह रहा हूं केवल इसीलिए आप धर्म परिवर्तन ना करें। अपनी बुद्धि को जो ठीक लगेगा वही करें। मेरे साथ न आने का आपने निर्णय किया, तब भी मुझे दुख नहीं होगा। उल्टे, अपनी जिम्मेदारी टलने से मुझे थोड़ी राहत लगेगी। यह परीक्षा की घड़ी है, यह बात आप ध्यान में रखेंगे ही। आपकी आने वाली पीढ़ी का भविष्य, आप जैसे तय करेंगे, वैसा बनने वाला है। आजादी पाने का निर्णय अगर आज आपने किया, तो आपकी आने वाली पीढ़ी आजाद होगी। आज अगर आप पराधीन रहने का निर्णय करते हैं, तो आपकी भावी पीढ़ी भी पराधीन रहेगी। इसीलिए आपकी जिम्मेदारी निभाना बहुत कठिन है।

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इस अवसर पर आपको क्या बताऊं, इस बारे में विचार करते हुए भगवान बुद्ध ने अपने भिक्खु संघ को परिनिर्वाण से पहले जो उपदेश किया था, जिसका जिक्र ‘महापरिनिर्वाण सुŸा’ में किया गया है, उसकी मुझे याद आती है। एक बार हाल ही में बीमारी से उठे भगवान बुद्ध विहार की छाया में फैलाए गए आसन पर बैठे थे, तब