506 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
उनका एक शिष्य आयुष्मान आनंद भगवान बुद्ध के पास आकर उनका अभिवादन कर एक तरफ बैठ गया। उसने कहा, मैंने भगवान बुद्ध को सुख में देखा है और बीमार थे तब भी देखा है। बुद्ध की बीमारी के कारण मेरा शरीर शीशे जैसा भारी हो गया और मुझे दिग्भ्रम हुआ है और धर्म की बाबत में भी कुछ सूझ नहीं रहा है। लेकिन उसी में थोड़ी राहत इस बात की है कि भिक्षु संघ के बारे में कुछ बताए बिना बुद्ध का परिनिर्वाण नहीं होगा। इस पर भगवान बुद्ध ने जवाब दिया, ‘आनंद! भिक्षु संघ को मुझसे क्या चाहिए? आनंद, मैंने बिना कुछ लुका-छिपी के धर्मोपदेश किया है। इसमें तथागत ने कुछ आचार्य सूप्ति नहीं रखी है। तो फिर आनंद, तथागत भिक्खुओं के बारे में क्या बताएंगे? सो, आनंद, आप सूरज की तरह स्वयंप्रकाशित बनें! पृथ्वी की तरह परप्रकाशित न रहें! खुद पर ही भरोसा रखें! अन्य किसी के अंकित न बनें! सत्य का साथ ना छोड़ें! सत्य का ही आश्रय लें! अन्य किसी की शरण ना जाएं!“ भगवान बुद्ध का यह उपदेश आप इस अवसर पर ध्यान में रखें, तो मुझे यकीन है कि आपका निर्णय गलत नहीं होगा।“ ख्1,
- ‘जनता’ : 27 जून, 1936