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मुंबई इलाका अस्पृश्य संत समाज परिषद का अधिवेशन दिनांक 1 जून, 1936
को मुंबई इलाका महार परिषद के लिए लगाए गए मंडप में डॉ. अम्बेडकर की
अध्यक्षता में हुआ था। डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर की धर्म परिवर्तन की घोषणा के
कारण अस्पृश्य समाज में ही नहीं, बल्कि पूरे हिंदू समाज में बड़ी हलचल मची थी।
सालोंसाल स्पृश्य हिंदुओं के अत्याचार सहते आए अस्पृश्य समाज के लोगों को डॉ.
बाबासाहेब अम्बेडकर द्वारा की गई धर्म परिवर्तन की घोषणा आजादी की देववाणी के
समान लगी हो तो उसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं। धर्म परिवर्तन की इस घोषणा
के बाद पूरे भारत में अस्पृश्यों की सभाएं, सम्मेलन हुए और उन्होंने डॉ. अम्बेडकर
की घोषणा को अपना समर्थन जाहिर करने वाले प्रस्ताव पास कर धर्म परिवर्तन
के लिए अपने तैयार रहने की बात उन्हें बताई। धर्म परिवर्तन के लिए विरोध दर्ज
करने वाले और दूसरों की अंजुली से पानी पीकर अपना स्वार्थ साधने वाले कुछेक
हरिजनों का अपवाद छोड़ दें तो अस्पृश्य समाज को धर्मांतरण के महत्त्व का पता
चल चुका है और उन्होंने अपनी सक्रिय तैयारी के लिए मुंबई में जैसी अखिल मुंबई
इलाके के महार बंधुओं द्वारा परिषद आयोजित कर डॉ. बाबासाहेब के धर्म परिवर्तन
के प्रस्ताव को सामुदायिक ढंग से समर्थन व्यक्त किया था, उसी तरह मातंग बंधुओं
ने और मुंबई इलाके के संत-महंत, साधु, बैरागी आदि लोगों ने भी अपनी परिषद
उपरोल्लिखित तारीख को ही ली थी।
इस परिषद की तैयारी के लिए साधु-संत लोगों ने एक स्वागत मंडल और कार्यकारी
मंडल की स्थापना की थी और एक विनंतिपत्र प्रकाशित किया था, जो इस प्रकार
था - ”इस परिषद में संत समाज के सभी लोग धर्म परिवर्तन के प्रस्ताव को अपना
समर्थन देकर इस प्रस्ताव पर अमल करने के लिए अपने परमपूज्य और सम्माननीय
नेता डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर जिस दिन धर्मांतरण करने के लिए कहेंगे, उसी दिन
छोटे-बडे़ सभी संत लोगों को उनके साथ धर्म परिवर्तन करने के लिए तैयार रहना
होगा। इस तरह बात पक्की करने के बाद ही संत समाज अपनी आगे की नीति तय
करने वाला है। संत समाज के हित के बारे में पूरी तरह सोच कर आगे की नीति
तय की जाएगी। इस परिषद को सफल बनाने के लिए स्वागताध्यक्ष महंत शंकरराव
नारायण दास बर्वे, कर्पुरनाथ गोकुलनाथ, तारकानाथ विट्ठलनाथ, वैद्व शंकरनाथ लक्ष्मण्
ानाथ, हरिदास योगानंद, दशरथनाथ विट्ठलनाथ, किसनदास शंकरदास महंत, रामनाथ
कडकनाथ, योगिनाथ रघुनाथ, जगन्नाथ भडकनाथ, काशिनाथ तुलसीनाथ महंत, सोमनाथ
दशरथनाथ, भक्तिदास आदि लोगों ने जी-तोड़ कोशिश की। किसी भी समाज पर