90. आज साधुता का केवल ढांचा बचा है - मई 1936 दादर (मुंबई) - Page 525

508 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

संत-महंतों का ही अधिक प्रभाव होता है। ऐसी स्थितियों में हिंदू धर्म के अनुसार आज तक अस्पृश्य वर्ग में ही जिनका अधिक उठना-बैठना होता था, उन संत-महंतों का ही धर्म परिवर्तन के लिए तैयार हो जाना विशेष अभिनंदनीय है। खैर...

परिषद से पहले कुछ स्वागत पद गाए गए। अध्यक्ष स्थान के लिए डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर का चुनाव हुआ, तब लोगों ने खूब तालियां बजा कर इस बात का स्वागत किया। सम्मेलन का वातावरण तालियों की आवाज से गूंज उठा। पहले स्वागताध्यक्ष महंत शंकरदास नारायणदास बर्वे ने सबका प्रेम के साथ स्वागत किया। उन्होंने अध्यक्ष डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर का परिचय देते हुए उन्हें ब्रह्मवेŸा और दर्शनशास्त्री कहा। उसके बाद के अपने स्वागत भाषण में धर्म परिवर्तन और संतों का कर्तव्य विषय पर विचार व्यक्त किए गए।

डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर की अध्यक्षता में हुई संतों की परिषद में जो प्रस्ताव सर्वानुमति से पारित किए गए वे इस प्रकार हैंः-

पहला प्रस्ताव :- ‘अखिल मुंबई इलाका संत परिषद’, मुंबई की ओर से सम्पूर्ण सोच-विचार के बाद जाहिर किया जाता है कि, अखिल भारतीय अस्पृश्यों के सर्वमान्य नेता डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर की धर्म परिवर्तन की घोषणा को और मुंबई इलाका महार परिषद द्वारा पारित किए गए धर्मांतरण के प्रस्ताव को समर्थन दे रहे हैं।

प्रस्ताव की सूचना दी - 1. भक्तिदास विट्ठलदास 2. गंगाराम रघुनाथ

प्रस्ताव रखा - सालुंकेबुवा. समर्थन दिया- हरिश्चंद्र ज्ञानदेव गायकवाड़, कमालदास सेवादास.

दूसरा प्रस्ताव :- संत परिषद घोषित करती है कि धार्मिक, शैक्षिक, राजनीतिक आदि मामलों में डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर के जो विचार और संदेश होंगे, वही संत समाज के धर्म, आचार-प्रचार रहेगा और संत समाज इसके अलावा अपनी कोई और नीति नहीं रखेगी।

प्रस्ताव रखा :- हरिदास तोरणे मास्टर, अनुमोदन - शिवराम गोपाल जाधव, विट्ठलनाथ तुलसीनाथ महंत।

तीसरा प्रस्ताव :- डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने धर्म परिवर्तन की घोषणा की है। उसके अनुसार पूरे अस्पृश्य समाज के धर्म परिवर्तन की घोषणा की है। तदनुसार अस्पृश्यों ने हिंदू धर्म के अलावा अन्य किसी भी धर्म को स्वीकारना तय किया है। हमें इस नए धर्म की सीख अस्पृश्य समाज को देना जरूरी है, इसलिए यह संत