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परिषद इस नए धर्म की पहचान कराने और उपदेश देने के लिए अपने प्रचारक देने के लिए तैयार है।
प्रस्ताव रखा - पतीतपावन बुवा। अनुमोदन दिया - दिगंबरनाथ नागनाथ
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कांबले। ख्1,
उपर्युक्त प्रस्ताव पर प्रमुख लोगों के भाषणों के बाद डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर से भाषण की विनती की गई। तब, उन्होंने अपने भाषण में कहा,
”संत मंडली और भाइयों-बहनों,
मैं खुद साधु नहीं हूं, लेकिन मेरा खानदान साधु का है। मेरे खानदान में लगभग तीन पीढि़यों तक बड़े श्रेष्ठ लोग साधु हुए। मेरे जीवन का लंबा समय संत समागम में बीता है। मुझे लगता है कि साधु हमारे लिए कई काम कर सकते हैं। उन सबके बारे में सोचने, विचार-विमर्श के लिए ही आज की यह संत सभा बुलाई गई है।
हमारे संतों ने एक बढि़या काम किया है। हिंदू धर्म में शूद्रों को विद्या पाने का अधिकार नहीं था। इतना ही नहीं, अगर आप मनुस्मृति पढें़, तो आपको पता चलेगा कि उसमें कहा है कि अगर कोई शूद्र वेदाध्ययन करेगा तो उसकी जीभ काट डालें, उसके कान में गरम सीसा डालें आदि। संत समाज ने अस्पृश्य वर्ग को ज्ञान देने का महान कार्य किया है। उनका काम और उसे पूरा करने के लिए उन्हें जिस तरह के अत्याचारों को सहना पड़ा उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। शूद्रों को ज्ञानप्राप्ति न हो, इसलिए हिंदुओं द्वारा किए गए कठोर बंदोबस्त के बावजूद और दबाव के बावजूद, इन संत लोगों ने ज्ञान प्राप्त करने की कोशिश की। उनकी ज्ञान की लालसा बहुत बड़ी थी। इसी साधु समाज द्वारा कुछ ऐसे धार्मिक ग्रंथ लिखे हैं कि वैसे ग्रंथ आज मिलना कठिन हैं। आज कई अस्पृश्य संतों के पास ऐसे कई हस्तलिखित पुरातन ग्रंथ हैं, जैसे हिंदू धर्माभिमानियों के पास भी नहीं होंगे। संत समाज ने अस्पृश्यों को जो ज्ञान दिया है, उसके लिए हमें उनका ऋणी रहना चाहिए।
आज संत समाज की स्थिति क्या है? जिन लोगों ने संतत्व स्वीकारा, उससे उन्हें खुद को क्या फायदा हुआ? उन्होंने आज तक क्या कमाया? अपनी ईश्वर भक्ति और ज्ञानप्राप्ति से क्या उनकी अस्पृश्यता खत्म, नष्ट हुई? उन पर लगा अस्पृश्यता का ठप्पा कभी भी धुला नहीं। महार संत, महार ही रहा। महार संत भले कितना ही विद्वान क्यों न हो, वह ब्राह्मण का गुरु नहीं बन सकता, इस तरह के वचन हिंदू धर्म के दिग्गजों ने लिख रखे हैं!
- जनता : 4 जुलाई, 1936