90. आज साधुता का केवल ढांचा बचा है - मई 1936 दादर (मुंबई) - Page 527

510 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

आज हमें सोचना होगा कि संत समाज की क्या जरूरत है? संत समाज की स्थापना पहले भगवान बुद्ध ने की। उनके जमाने में इस समाज को भिक्खु समाज कहा जाता था। भगवान बुद्ध ने भिक्खु समाज की स्थापना क्यों की? क्योंकि समाज के सभी लोग अपने प्रपंच में उलझने के कारण उनका बौद्धिक विकास नहीं हो पाता। ऐसा समाज सत्य और कुछ समय बाद समाज से भी महरूम होता है। इसीलिए समाज स्वार्थरहित और आदर्श होना चाहिए। इसी विचार से भगवान बुद्ध ने भिक्खु समाज की स्थापना की। भिक्खुओं पर उन्होंने कई निर्बंध लगाए ताकि उनका मन दोबारा प्रपंच की तरफ न मुड़े। भिक्खुओं का प्रमुख काम था, स्वधर्म का प्रचार और प्रसार करना। आज का संत समाज बुद्ध के समय के भिक्खु समाज का ही कठिनतम रूप है। आज इस समाज की भिक्षुत्व की संकल्पना खत्म हो चुकी है और भिक्षा मांगना केवल पेट भरने का धंधा बन कर रह गया है।

संतों पर समाज की जिम्मेदारी होना जरूरी है। लेकिन आज के साधू लोग करते क्या हैं? बदन में राख लगा कर समाज से दूर रहते हैं। जटाएं, बढ़ी हुई दाढ़ी, मालाएं, रंगीन कपड़ों के टुकड़ों से ही साधु नहीं बनते, ये केवल बाहरी लक्षण हुए। आज समाज में हर कहीं अधोगति के लक्षण दिखाई दे रहे हैं। समाज में हर जगह जुल्म और जबर्दस्ती के लक्षण दिखाई दे रहे हैं। समाज में हो रहे अत्याचार, जोर-जुल्म का प्रतिकार करना साधुओं का कर्त्तव्य है। वही लोक कल्याण है। वही असल लोक सेवा है।

धर्म परिवर्तन के काम में इन्हीं संतों की बड़ी मदद होगी। हम जो नया धर्म स्थापन करने जा रहे हैं, उस धर्म का महत्त्व गांव-गांव जाकर प्रसार करने के लिए उनकी बहुत मदद मिलेगी। ये लोग धर्म का उपदेश करने के काम बहुत अच्छी तरह से करेंगे। इन विद्वानों के हाथों नए धर्म की शिक्षा देने के काम को बहुत अच्छी तरह अंजाम दिया जाएगा।

आज साधुता का केवल ढांचा भर रह गया है। इन साधुओं को चाहिए कि इस नए कार्यक्रम को अपने में संचारित करके नया जीवन प्राप्त करें। आज केवल गले की मालाओं को नहीं वरन् स्वार्थत्याग को बहुत महत्त्व प्राप्त है। इसीलिए संतों को महान धर्म स्थापन करने का नया कार्य शुरू करना चाहिए। इतना ही कह कर मैं अपना भाषण पूरा करता हूं।“ ख्1,

इस समारोह में संतों की तरह अन्य लोग भी उपस्थित थे। उनमें मुंबई इलाका महार परिषद के अध्यक्ष मि. बी. एस. वेंकटराव, भाई अनंतराव चित्रे, मे. शिवतरकर,

  1. अस्मितादर्श : संपादक - गंगाधर पानतावणे, दिवाली अंक, 1978