90. आज साधुता का केवल ढांचा बचा है - मई 1936 दादर (मुंबई) - Page 528

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सुभेदार सवादकर, डी. वी. प्रधान, एम. के. कर्णिक, दिवाकर पगारे, रेवजीबुवा डोलस, संभाजी तुकाराम गायकवाड़, अण्णासाहेब पोतनीस, चांगदेव मोहिते, शांताराम अनाजी उपशाम, अॅ. कवली, देवराव नाईक, अमृतराव रणखांबे, भाऊराव गायकवाड़ आदि प्रमुख लोग उपस्थित थे। उसी तरह संत महंत मंडली से पतितपावन दास बुवा, गणपतबुवा उर्फ मडकेबुवा, शिवराम गोपाल जाधव, सेवकनाथ शृंगीनाथ, जगन्नाथ तारक नाथ, गणेशनाथ सिद्धनाथ, बुद्धिनाथ विट्ठलनाथ, भाविकनाथ भडकनाथ, चंचलनाथ भडकनाथ, भडकनाथ आलखनाथ, सेवकनाथ, केशवनाथ, माधवदास देवकादास, मेनीनाथ तारकनाथ, किसनदास गोविंददास, गोपीनाथ गंगानाथ, अंकुशबुवा राघोजी फणसे, किसनदास शंकरदास, संभुनाथ गोविश्वनाथ, मंत्रीनाथ गरीबनाथ, चतुरनाथ चितगंगानाथ, आदिनाथ मेनीनात, दशरथनाथ विठ्ठलनाथ, रामनाथ कडकनाथ, बालकनाथ सेवकनाथ, श्रीपतीदास मुक्तिदास, यमाजीदास पांडवदास, अंबरदास लक्ष्मणदास, रमाजीनाथ आत्मारामनाथ, कमालदास सेवादास और गरीबनाथ तारकनाथ आदि लोग उपस्थित थे।

इस प्रस्ताव पर संत परिषद में जो भाषण हुए वे बहुत ही प्रभावी और विचारोŸोजक थे। इससे अन्य समाजबंधुओं की तरह ही अस्पृश्य संत मंडली का भी डॉ. बाबासाहेब के कार्य को कितना समर्थन है, इसका पता चलता है। हिंदू धर्म के रीति-रिवाजों के अनुसार इन संत मंडली के आज तक जो आचार-विचार व्यवहार में रूढ़ हो चुके थे, उन्हें इस परिषद में खत्म कर दिया गया। इसके अलावा हिंदू धर्म के जिन ग्रंथों ने आज तक अस्पृश्य लोगों को गलत राहें बताईं, जिन्हें विषमता और गुलामी के वातावरण में अत्याचार सहने पर मजबूर किया, स्वाभिमान से महरूम किया उन धर्मग्रंथों का इस परिषद में खुलेआम दहन किया गया।

इस परिषद में इससे भी बडी महत्वपूर्ण एक बात हुई। आज तक पिछले हजारों साल से ये साधु-संत हिंदू धर्म की सीख के अनुसार बर्ताव करते आए थे, उन्होंने दाढ़ी-मूंछे बढ़ाई थी, वे जटाधारी भी बन गए थे। उनके गले में मालाओं की लडि़यां लटकती रहती थीं। कई संप्रदायों के संत हाथों में, कानों में, गले में गंडे, धागे मालाएं आदि पहना करते थे। लेकिन बाबासाहेब ने हिंदू धर्म की विषमता तथा अस्पृश्यों के साथ हुए अन्यायपूर्ण बर्ताव के बारे में बता कर जब धर्म परिवर्तन की घोषणा की तब इस अन्याय के प्रति साधु-संतों में भी जागरुकता आई। उन्होंने डॉ. बाबासाहेब की सलाह के अनुसार बर्ताव का निर्णय लिया। इस परिषद में हजारों सालों से मन पर हुए संस्कारों के कारण स्वीकारे गए अलंकारों का त्याग किया। परिषद के भव्य मंडप में तैयार किए गए अग्निकुंड में सैंकडों साधु-संतों ने अपनी दाढ़ी-मूंछें. जटाएं और अलंकार तथा संत-महंत होने की बाकी सभी निशानियां अग्नि को समर्पित कर दीं। इस तरह से उन्होंने अपने धर्मांतरण के निश्चय का डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर