90. आज साधुता का केवल ढांचा बचा है - मई 1936 दादर (मुंबई) - Page 529

512 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

के सामने प्रत्यक्ष कृति के जरिए प्रदर्शन किया। इन साधु-संतों के निश्चयी मन का तथा उनके द्वारा दिखाया गया मनोधैर्य, स्पृश्यवर्गीय साधुओं के लिए ही नहीं वरन् सभी लोगों के लिए उदाहरणस्वरूप रहा।

संत समाज के इस अधिवेशन का अन्य अस्पृष्य समाज पर बहुत ही परिणाम हुआ। दाढी, मूंछे, जटाएं अग्नि को समर्पित कर मुक्त हुए संतों को अस्पृश्य समाज में धर्म परिवर्तन से संबंधित प्रचार कार्य करने के लिए, या फिर समाज कि हितों के काम दिए जाएंगे। इस तरह समाज की सेवा करने के लिए कई साधू-संत तैयार हुए हैं। देवी-देवताओं के भजन-पूजन में व्यर्थ समय गंवाने के बजाय, उनका निःस्वार्थ भाव से जनसेवा करना ही ईश्वरसेवा के समान होगा। कुल मिला कर संत परिषद का यह कार्य सफल भी हुआ। लेकिन हजारों सालों से जिन रूढि़यों से भरे धर्म के नाम से ये संत जी रहे थे, उसकी दांभिकता का भी उन्हें अहसास हुआ। इसीलिए डॉ. बाबासाहेब की धर्मांतरण की घोषणा के साथ वे उस धर्म का त्याग करने के लिए भी तैयार हुए और उन्होंने उस तरह से प्रत्यक्षकृति की। यह सब अस्पृश्य संत समाज के लिए गर्व की बात है। दाढ़ी, जटाएं आदि अग्नि को समर्पित करने का कार्यक्रम पूरा होने के बाद संत परिषद का अधिवेशन डॉ. बाबासाहेब की जयकार में संपन्न हुआ। ख्1,

  1. जनता : 4 जुलाई, 1936