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दिनांक 1 जून 1936 के दिन डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर का राजनीतिक परिषद
के सामने भाषण हुआ। उन्होंने अपने भाषण में कहा,
”कल ही धर्म परिवर्तन के बारे में भाषण देते हुए मैंने सामाजिक सुधार पहले या
राजनीतिक सुधार पहले इस विषय पर काफी ऊहापोह किया है। इंसान की और
समाज की प्रगति के लिए कई साधनों का इस्तेमाल करना पड़ता है। कौन-सी बात
पहले और कौन-सी बात उसके बाद करनी है, यह विवाद ऐसे मामलों में बेकार होता
है। मैं कह सकता हूं कि अस्पृश्यों को धर्म परिवर्तन की जितनी आवश्यकता है, उतनी
ही राजनीति की भी है। जिस तरह से धर्मांतरण के बारे में आपकी क्या राय है, यह
हमने कल आजमाकर देखा उसी तरह राजनीति के बारे में आपकी राय आजमाना
बहुत जरूरी है। हम लोग कहीं बैठ कर राजनीतिक विषयों के बारे में चर्चा करें,
ऐसा मुझे कई दिनों से लग रहा था। लेकिन इस प्रकार का मौका अब तक उपलब्ध
नहीं हो पाया था। आज वह प्राप्त हुआ, इसका मुझे बड़ा संतोष है। राजनीति का
विषय कोई आसान विषय नहीं। आप सबको यह विषय समझ में आए, इसके लिए
मैं अपने विचार आसान शब्दों में व्यक्त करने की कोशिश करने वाला हूं।
आपमें से जो भी ‘जनता’ या कोई अन्य अखबार पढ़ते होंगे उन्हें पता होगा कि
अगले साल में अप्रैल महीने की पहली तारीख को भारत देश में नए सुधार लागू
होने वाले हैं। इन सुधारों के संदर्भ में हमारी नीति क्या होनी चाहिए और उन सुधारों
से फायदा उठाने के लिए, हमें किस तरह का संगठन बनाना होगा, इस विषय पर
सोचने-विचारने की जरूरत है।
इन राजनीतिक सुधारों के बारे में भारत के लोगों का जो मत हो सो हो। इस
संविधान से भारत देश की हालत ठीक होगी या नहीं होगी, इस बारे में हमें सोचने
की जरूरत नहीं है। जिन राजकीय सुधारों को लेकर विचार होने वाला है और जिन
पर अमल किए जाने की बात चल रही है, वे अधूरी हैं और इसलिए अस्वीकार की
जानी चाहिएं। कांग्रेस तथा अन्य पक्ष इस तरह की घोषणाएं कर रहे हैं। जो लोग
इन सुधारों का विरोध करने के बारे में कहते हैं उनसे मुझे कुछ लेना-देना नहीं है।
राज्य की प्रचलित व्यवस्था से भी यह व्यवस्था बुरी है, ऐसा कुछ लोगों का कहना
* ‘जनता’ : 4 जुलाई, 1936