91. अपनी पार्टी के लायक उम्मीदवार को ही चुन कर विधिमंडल में भेजें - जून 1936 मुंबई - Page 531

514 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

है। इस बारे में मैं इतना ही कहना चाहता हूं कि इन नए राजनीतिक सुधारों के कारण देश का बहुत भला नहीं भी हो रहा हो, मगर उन्हें लागू करने से देश की बिल्कुल उन्नति नहीं होगी, यह भी मैं नहीं कह सकता। ये राजनीतिक सुधार अधूरे हैं, कहने वालों के मुद्दों से मैं सहमत हूं। लेकिन उस राजनीतिक हालात से जोड़ कर देखें तो इनके बारे में जो कुछ लोगों की राय है कि इन सुधारों के कारण हम पिछड़ गए हैं, तो यह बात मैं नहीं मान सकता। जो लोग ऐसा कहते हैं उन्होंने राजनीति के बारे में अध्ययन नहीं किया हो, ऐसी बात नहीं है, लेकिन मैंने भी उन्हीं की तरह थोड़ी बहुत राजनीति पढ़ी है।

कुछ लोग कहते हैं कि इस नए संविधान के कारण देश पीछे हट गया है, मैं उनकी बात से भी असहमत हूं। इतना ही नहीं मुझे तो प्रामाणिकता से ऐसा लगता है कि भले उन सुधारों में कुछ कमियां हों लेकिन उनके कारण फिलहाल जो हाल हैं, उनमें निश्चित तौर पर सुधार आने वाला है।

इन राजनीतिक सुधारों को स्वीकारना नहीं चाहिए, उन पर अमल नहीं करना चाहिए, ऐसा जो लोग कहते हैं, उनसे पूछना पडे़गा कि अगर आप सुधार नहीं चाहते हैं, और आप पूरी आजादी चाहते हैं तो उस आजादी को पाने के लिए आपके पास क्या साधन हैं? पूरी आजादी पानी हो तो सेना और सामग्री इकट्ठी कर आयरिश लोगों की तरह अंग्रेज सरकार के खिलाफ विद्रोह करना होगा। लेकिन क्या भारत के लोग यह कर सकते हैं? ब्रिटिश साम्राज्य कितना बड़ा है, उनकी सेना-सामग्री कितनी अधिक है, यह जब मैं गोलमेज सम्मेलन गया था, तब मैंने देखा है।

जो लोग सुधार नहीं बल्कि केवल आजादी चाहते हैं, उन्हें अंग्रेजों के विस्तृत साम्राज्य के साथ लड़ाई करनी हो तो इस सामग्री के साथ टक्कर ले सके ऐसी सामग्री चाहिए, जो पाना कितना कठिन है। इस कारण से कहिए या कि विश्वास है इसलिए कहिए, इस लड़ाई के लिए लोगों ने बिना अत्याचार का मार्ग अपनाया है। वह मार्ग है असहयोग आंदोलन का। यह मार्ग कितना असरदार है इसका अनुभव हाल ही में सबको हो चुका है। हवा से जैसे पेड़ हिलता है, उसी तरह अंग्रेज सरकार हिल गई। लेकिन वह पलट कर गिर नहीं गई। काँग्रेस द्वारा ढूंढा गया यह इकलौता इलाज पूरा नहीं पड़ा। अब दोबारा उसी राह को अपनाने में क्या हासिल यह मेरी समझ में नहीं आ रहा। मेरे मत में असहयोग का यह मार्ग बहुत ही विघातक है। उससे अगर सफलता नहीं मिली तो बहुत नुकसान होने की संभावना है।

इस अवसर पर मुझे इंग्लैंड के इतिहास में घटी एक कहानी याद आ रही है। फ्रांस में राज्यक्रांति शुरू थी, तब इंग्लैंड में राजनीतिक अधिकारों की प्राप्ति के लिए लोगों ने जोरदार आंदोलन छेड़ा था। ये राजनीतिक अधिकार पाने के लिए जो लोग