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लोगों ने अभी-अभी पारित किया है। सो, जो प्रस्ताव पारित हो चुका है, उसके बारे में बोलना निरर्थक है। सच कहें तो धर्मांतरण के बारे में आपकी सभा में बोलने की मेरी बिल्कुल इच्छा नहीं थी। मातंग सभा में आकर भाषण करने की सूचना जब आपकी स्वागत समिति से आई, तब मैंने साफ तौर पर कहा था कि, भाषण देने में कोई हर्ज तो नहीं है लेकिन मैं धर्म परिवर्तन के बारे में कुछ नहीं बोलूंगा। अगर इस सभा में मैं धर्म परिवर्तन के बारे में बोलता और अगर उसके बाद धर्मांतरण का प्रस्ताव रखा जाता और पारित होता तो क्षुद्र बुद्धि के लोगों को बातें फैलाने का मौका मिलता कि मेरे लिहाज के कारण, या मेरे दबाव में आकर मातंग लोगों ने धर्म परिवर्तन का प्रस्ताव पारित किया है। ऐसा होता तो आपके किए धर्म परिवर्तन के प्रस्ताव को उतना महत्व नहीं दिया जाता, जितना कि दिया जाना जरूरी है। आपकी परिषद का महत्व बिना वजह कम आंका जाता। धर्म परिवर्तन कभी भी जबरस्ती से या अनिवार्य ढंग से लागू नहीं किया जा सकता। इस बारे में किसी पर जबरदस्ती करना संभव नहीं और लिहाज का वास्ता दिलाना ठीक नहीं। जिसे ठीक लगेगा वही धर्म परिवर्तन करेगा। सो, धर्म परिवर्तन पर मैंने यहां नहीं बोलने का जो निर्णय लिया है, उसके बारे में आपमें से किसी को बुरा नहीं लगेगा और कोई इसे अन्यथा नहीं लेगा ऐसा मैं समझता हूं।
‘महार-मांग समाज में एका कैसे होगा?’ केवल इसी एक विषय पर मैं आज इस सभा में बोलना चाहता हूं। गांव-गांव में मैंने देखा है कि महार-मांग समाज के बीच आपसी दुश्मनी है। उनके बीच कोई मित्रता नहीं। इस बात पर पर्दा डालते रहने का कोई फायदा नहीं है। इन दो समाजों में दुश्मनी है। आप और हमारा यह कर्तव्य बनता है कि हम सोचें कि इन दो समाजों के बीच की दुश्मनी नष्ट कैसे होगी? लंबे समय से यह मनमुटाव चला आ रहा है। मैंने जब से इसके बारे में सुना है, तभी से, मेरे संपर्क में जो मांग लोग हैं, उनसे पिछले पांच-छह सालों से मैं कहता आया हूं कि कोई सभा वगैरह का आयोजन कीजिए और मुझे बुलाइए ताकि मांग और महार लोग अगर मुझसे कुछ कहना चाहते हों तो कह सकें। लेकिन इस तरह की सभा का वे आज तक आयोजन नहीं कर पाए थे। इसलिए मैं आ नहीं पाया था। मैं जिस मौके के इंतजार में था वह मौका आज मुझे मिला इसकी मुझे खुशी है। जिन्होंने इस सभा का आयोजन कर मुझे यह मौका दिया मैं उनका आभारी हूं। मांग समाज में सुधार का जो आंदोलन चला है, उसका अगर बारीकी से निरीक्षण करें तो पता चलेगा कि उस आंदोलन का पूरा निशाना महार समाज के ऊपर ही है। महारों के साथ व्यवहार ना रखें, महारों का अनाज मत खाएं, उन्हें झाडू ना बेचें, उनके स्पर्श को अपवित्र मानें आदि बातें मांग नेता मांग लोगों से कहते हैं ऐसा मैंने सुना है। उनकी इस सीख का मुझे कोई खेद नहीं है। आपके स्वाभिमान को लगता होगा कि