522 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
महार मेरे हाथ का खाता नहीं है तो मांग भी उनके हाथ का क्यों खाएं? इसीलिए आप उनके हाथ का ना खाएं। लेकिन यहां मैं जो सवाल पूछना चाहता हूं वह यह है कि, महार ही आपके हाथ का खाना नहीं खाते, ऐसी तो कोई बात नहीं है। ब्राह्मण लोग भी आपके हाथ का छुआ नहीं खाते, और किसी जाति के लोग भी आपके हाथ का छुआ नहीं खाते। यह बात अगर सच है तो फिर आपके नेता ब्राह्मणों के हाथ का ना खाने का उपदेश क्यों नहीं देते? जिन-जिन जातियों के लोग मांगों के हाथ का नहीं खाते उन-उन जातियों के लोगों के हाथ का छुआ आप भी ना खाएं, ऐसा उपदेश यदि वे करें तो उन पर कोई दोष नहीं लगेगा। उल्टे मैं उनका उपदेश पूरी तरह मानूंगा, क्योंकि स्वाभिमान सबका होता है। होना ही चाहिए। लेकिन ब्राह्मण् ां के हाथ का ना खाएं, मराठों के हाथ का ना खाएं इस तरह का उपदेश किसी मांग नेता ने किया हो, मेरे सुनने में तो नहीं आया है। उल्टे, महारों के हाथ का न खाएं, बस इतना ही उन्हें बताया जाता है। मांग नेता इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि यह सीख द्वेषमूलक है। मैं खुद उच्च-नीच आदि किसी तरह का भेदभाव नहीं मानता और महार जाति ने भी उच्च-नीच भेदभाव मानना छोड़ दिया है। चमार लोग खुद को ऊंचा मानते हैं और कहते हैं कि हम महारों-मांगों के हाथ का नहीं खाते। आप भी उनकी तरह कहने लगे हैं कि महारों के हाथ का छुआ हम नहीं खाएंगे। सच कहें तो कोई जाति किसी अन्य जाति से उच्च है, इस बात का कोई आधार या सबूत नहीं है। किसी जाति के श्रेष्ठत्व का कोई ताम्रपट्ट उपलब्ध नहीं है। कौन किसके हाथ का छुआ खाता है, या नहीं खाता है, इसी एक बात के आधार पर हिंदू समाज में जातियों का श्रेष्ठत्व आधारित होता है। फलां जाति किसी दूसरी से श्रेष्ठ सिर्फ इसलिए मानी जाती है, क्योंकि वह फलां जाति के लोगों के हाथ का छुआ नहीं खाती, इसलिए। लोगों के लिए इतना ही कारण काफी होता है। इसीलिए कई जातियां खुद को अन्य जातियों से श्रेष्ठ बताने के लिए अन्य जातियों के साथ अन्न-जल व्यवहार त्याग देते हैं। आपने भी लगता है कि इसी मार्ग का अवलंब किया हुआ है। महारों के हाथ का छुआ न खाने के पीछे खुद को महारों से श्रेष्ठ कहलाने के अलावा कोई और उद्देश्य होगा, मुझे नहीं लगता। लेकिन ऐसी सीख देने वाले मांग नेताओं ने लगता है कि एक बात की तरफ ध्यान नहीं दिया है। महारों से श्रेष्ठ कहलाने में मांगों का क्या हित साधा जा सकता है, मेरी समझ में नहीं आ रहा। महारों से बड़ा कहलवाने से ब्राह्मण लोग, मराठा लोग अगर उन्हें अपने साथ शामिल कर लेते हों तो बात अलग है। महारों से बड़ा कहलाने से ब्राह्मण लोग अगर मांगों को अपनी बेटियां देने या उनकी बेटियों को बहू के रूप में अपनाने के लिए तैयार हों तो ही मांगों का महारों के हाथ का छुआ न खाने में कुछ तथ्य है, ऐसा मुझे लगता है। सो, इस बात का जरूर खयाल रखें कि क्या ब्राह्मण लोग या अन्य स्पृश्य जातीय लोग आपको अपनाने के लिए तैयार हैं अथवा नहीं, इस