92. धर्म परिवर्तन से अस्पृश्यों को समानता का अधिकार प्राप्त होगा - जून 1936 मुंबई - Page 540

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बात के बारे में आपको पूरी तरह छानबीन करनी चाहिए। वे अगर तैयार नहीं हों तो बेकार महारों के साथ छोटे-बड़े का बखेड़ा खड़ा कर झूठा दंभ बढ़ा कर मांग लोग अपना ही नुकसान करवा लेंगे, ऐसा मुझे डर लगता है। दूसरी बात यह कि, मांग और चमार लोग अगर यह कहने लगें तो महार भी कह सकेंगे कि हम चमार और मांगों के हाथ का छुआ नहीं खाते। कुछ महार लोग ऐसे हैं जो कहते हैं कि मांग और चमारों में दुरभिमान की जो हेकड़ी है, उसे तोड़ना चाहिए। वे अगर हमारे साथ खाते-पीते नहीं, तो हमें भी उनके साथ कोई व्यवहार नहीं रखना चाहिए। मैं आपसे यह कहना चाहता हूं कि महार लोग अगर अपनी जाति के बारे में अभिमानी हो गए और उन्होंने अगर तय किया कि वे मांग और चमारों से किसी तरह का कोई ताल्लुक नहीं रखेंगे, तो वे मांगों और चमारों को काफी नुकसान पहुंचा सकते हैं। अस्पृश्यों में महार बहुसंख्यक जाति है। उनके बगैर अस्पृश्यों का कोई भी आंदोलन या अस्पृश्यों की राजनीति संभव नहीं हो सकती। महारों के बगैर ही हम कुछ करेंगे, ऐसा अगर मांग और चमारों का कहना हो तो बहुत जल्द उन्हें इस बात का पता चल जाएगा कि यह बस उनकी गलतफहमी है। हालांकि किसी ने बछड़ा मारा, इसलिए हम गाय मारेंगे यह कहना जिस तरह न्यायपूर्ण नहीं हो सकता, उसी तरह मांग और चमार दुरभिमान के कारण महारां के साथ अगर संबंध नहीं रखेंगे, तो महारों को भी उनके साथ संबंध नहीं रखना चाहिए, यह कहना खुद मुझे पसंद नहीं है और मैंने यही सोच महार समाज को दी है। महार लोग जाति के प्रति अभिमान नहीं पालना चाहते न वे अपने को मांगों से या चमारों से श्रेष्ठ कहलवाना चाहते हैं। वे अपना तथा अन्य सभी अस्पृश्यों का संगठन बनाना चाहते हैं। इसीलिए महार लोग झूठे अभिमान के शिकार न होकर सभी अस्पृश्यों को साथ लेकर आंदोलन छेड़ना चाहते हैं। कोई यह आरोप नहीं लगा सकता कि महार लोग जातिभेद को नहीं मानते, यह केवल उनका मौखिक कथन है वास्तविकता नहीं। वे इस पर अमल भी कर रहे हैं, यह बात मैं सबूत के साथ साबित कर सकता हूं। पुणे में एक अछूतों का छात्रावास है, यह आप लोग जानते होंगे। सरकार की तरफ से यह छात्रावास चलाया जाता है। उस छात्रावास में महार, मांग चमार आदि जातियों के बच्चे रहते हैं। पहले वहां सभी के लिए खाना बनाने के लिए एक ही खानसामा रखा गया था और सब बच्चे एक ही पंगत में बैठ कर खाना खाया करते थे। कुछ समय बाद चमार जाति के नेताओं ने चमार बच्चों के कान फूंके कि आपको महार-मांगों के साथ बैठ कर

खाना नहीं खाना चाहिए। उनका छुआ खाना नहीं खाना चाहिए। परिणामस्वरूप इस छात्रावास में महार-मांग-चमार जाति के छात्रों में घमासान मचा। महार बच्चे भी हठ करने लगे कि हम भी किसी के हाथ का नहीं खाएंगे और हमारे लिए भी एक अलग रसोइए का प्रबंध किया जाए।