7. जागृति की ज्योत को कभी भी बुझने न दें - मार्च 1927 कोलाबा - Page 54

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उदाहरण भी हाल ही में घटी एक घटना जिसे आप सब लोग जानते हैं। 1917 में शुरू हुए विश्वयुद्ध में अंग्रेज सरकार को फिर अस्पृष्यों की याद हो आई। हमारे अस्पृष्य वर्ग में सेना में भर्ती होने के लिए हमेशा ही जबरदस्त उत्साह होता है। एक पलटन, रेजीमेन्ट चाहिए थी मगर दो रेजीमेन्ट बनाने लायक लोग स्वखुशी से तैयार थे। सरकार ने एक पलटन बनाई। सभी को इस बात की खुशी हुई कि एक बार लगी पाबंदी खत्म होकर सेना में फिर भर्ती शुरू हुई। ऐसी उम्मीद जगी कि इस प्रदेश के अस्पृश्यों का फिर भाग्योदय शुरू हो गया है। लेकिन युद्ध खत्म होने के बाद फिजूलखर्ची रोकने के नाम पर पलटन को भंग कर दिया गया। यह समझ में नहीं आता कि सरकार के इस मनमाने व्यवहार को क्या कहा जाए?

सज्जनों! मेरी यह राय है कि हम हमेशा सरकार का साथ देते रहे हैं, इसलिए सरकार हमेशा हमारी उपेक्षा करती है। सरकार जो देगी वह स्वीकार कर लेना, जो कहेगी वह सुनना, मानना, जैसे रखेगी वैसे रहना ऐसी जो हमारी दासता की आदत है वही हमारी सरकार के द्वारा उपेक्षा का मुख्य कारण है। हम अपने पर होने वाले अन्याय को चुपचाप सहन करते हैं। कोई दाएं गाल पर थप्पड़ मारे तो हम अपना बायां गाल आगे कर देते हैं मगर मारने वाले का प्रतिकार करने के लिए हमारे हाथ नहीं उठते। आसमान भी टूटे तो भी हम किसी हताश व्यक्ति की तरह उसे अपना भाग्य मान करें हाथ पर हाथ धरे बैठ जाते हैं। इस आत्मघाती प्रवृŸा का हम जितनी जल्दी त्याग करे उतना ही हमारे लिए लाभदायी है। इसलिए मैं आपसे कहता हूं कि हमें सेना में भर्ती पर लगी पाबंदी पर खत्म कराने के लिए हर संभव प्रयास करना चाहिए।

लेकिन मैं आपके सामने यह सवाल रखना चाहता हूं कि सेना में भर्ती शुरू हो जाने से क्या सब कुछ ठीक हो जाएगा? आप में से बहुत से लोगों को यह लगता है कि एक बार सेना में भर्ती शुरू हो गई यानी सब हो गया बाकी कुछ करने की जरूरत ही नहीं है। मुझे लगता है कि यह बड़ी भूल है। एक बात तो यह है कि सभी लोगों का सेना में भर्ती होना संभव नहीं है। जब किसी भी वर्ग के लोग सेना में भर्ती होने के लिए तैयार नहीं थे तब हमारे लोगों के लिए काफी संभावनाएं थीं। मगर अब ऐसी हालत नहीं है। हमें औरों की तरह जो मिलना है वही मिलेगा। ज्यादा की उम्मीद करना बेकार है। इसलिए हमें इस बात पर विचार करना चाहिए कि सेना में भर्ती के अलावा उन्नति के और कौन से तरीके हो सकते हैं? अस्पृश्य समाज में व्यावसायिक जाति में समाविष्ट लोग बहुत कम हैं। केवल चमार लोग ही पेशेवर हैं। लेकिन अब उन्होंने भी यह धंधा लगभग छोड़ दिया है। इसलिए गैर-पेशेवर लोगों की ही संख्या अधिक है। जहां यह परंपरा है कि फलां धंधा फलां जाति की बपौती है वहां यह कहना कि फलां धंधे में आपके लिए काफी गुंजाइश है यह व्यर्थ का उपदेश है। उन्हें अगर धंधा करना है तो वह व्यवसाय इस प्रकार का होना चाहिए जो करने की