7. जागृति की ज्योत को कभी भी बुझने न दें - मार्च 1927 कोलाबा - Page 55

38 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

छूट किसी भी जाति के आदमी को हो। इस प्रकार के मुझे दो ही पेशे दिखते हैं - एक सफेदपोश और दूसरा खेती।

यह मैं जानता हूं कि ऊंची जातियों के लोगों को यह बात पसंद नहीं है कि अस्पृश्य वर्ग के लोग सफेदपोश पेशे अपनाएं। उन्हें ऐसा लगता है कि अस्पृश्य वर्ग के लोगों को बढ़ईगीरी, लुहार का काम, बुनाई आदि व्यवसाय करने चाहिए। कुछ भी हो जाए, वे सफेदपोश धंधे न अपनाएं। मैं आपसे साफ-साफ कहना चाहता हूं कि उनका यह उद्देश्य हमारे हित में नहीं है। मेरी यह राय है कि अस्पृश्य वर्ग की स्थिति में सुधार के लिए दो बातें बेहद जरूरी हैं - एक, उनके मन पर पुरानी पोंगापंथी व अनिष्ट विचारों की जो जंग लगी है उसे मांज कर साफ करना चाहिए। जब तक आचार, विचार और उच्चार की शुद्धि नहीं होती तब तक अस्पृश्य समाज में जागृति या प्रगति के बीज कभी भी पनप नहीं पाएंगे। अभी की स्थिति में उनके मन की पथरीली जमीन पर कोई भी अंकुर उग नहीं सकता उनके मन को इस तरह से सुसंस्कारित बनाने के लिए उन्हें सफेदपोश पेशों को अपनाना चाहिए। जब मैं कहता हूं कि अस्पृश्यों को सफेदपोश पेशों को अपनाना चाहिए तो इसकी एक और वजह भी है। सरकार एक बहुत महत्वपूर्ण संस्था है। सरकार जैसे चाहेगी वैसे ही सब कुछ घटित होगा। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सरकार क्या करेगी यह पूरी तरह से सरकारी कर्मचारियों पर निर्भर होगा क्योंकि सरकार का मन यानी सरकार के कर्मचारियों का मन। इससे एक बात साबित होती है वह यह कि यदि सरकार से हमें अपने हित में कुछ करवाना है तो हमें सरकारी नौकरियों में प्रवेश पाना होगा। नहीं तो हमारी आज जो उपेक्षा हो रही है वह हमेशा होती रहेगी अगर हमारी इच्छा है कि ऐसा न हो तो अस्पृश्य वर्ग के लोगों को इस बात की व्यवस्था करनी चाहिए कि उनका सरकारी नौकरियों में अधिक प्रमाण में प्रवेश हो। इसके बगैर उनकी हालत कभी बेहतर नहीं हो सकती और सरकारी नौकरियों में सम्मिलित होने के लिए सफेदपोश पेशा अपनाने के अलावा और कोई रास्ता नहीं है। मुसलमान और मराठा जातियों ने इन बातों का महत्व समझा है और इस मामले में उनकी काफी कोशिशें चल रही हैं। हमें भी समय पर जाग कर अपनी भागीदारी हासिल कर लेनी चाहिए।

ब्राह्मण लोग इस आंदोलन की निंदा करते हैं और यह कहते फिरते हैं कि सरकारी नौकरियों में कुछ नहीं रखा है। लेकिन उनके इस कहने में न सच्चाई है और न ईमानदारी। यह इसलिए सच नहीं है यदि इस देश के ब्राह्मणों के पास सरकारी नौकरी का अधिकार नहीं होता तो वे अन्य प्रदेश के ब्राह्मणों की तरह भिश्ती (पानी भरने वाले) या रसोइए होते। यहां के ब्राह्मणों की श्रेष्ठता अगर केवल पुराणों पर आधारित होती तो अन्य जगहों की तरह वह पहले ही ढह जाती। मगर उसे सरकारी नौकरियों के अधिकार का संबल होने के कारण वह टिकी रही। इस