92. धर्म परिवर्तन से अस्पृश्यों को समानता का अधिकार प्राप्त होगा - जून 1936 मुंबई - Page 541

524 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

बात इतनी बढ़ गई कि खुद मुझे मुंबई से पुणे जाना पड़ा। वहां जाकर मैंने महार बच्चों को समझाया। कहा, ‘अगर चमार मूर्ख हुए तो जरूरी नहीं कि महार भी मूर्ख हो जाएं। मैंने उन्हें सलाह दी कि चमार अगर महारों के साथ नहीं खाएंगे, तो कोई बात नहीं, आप मांगों के साथ मिल कर खाइए। मैं अगर जाति अभिमान से पीडि़त होता तो महारों के बच्चों को मैं भी सलाह देता कि अगर मांग और चमार आपके साथ खाना नहीं खाना चाहते तो आप भी उनके साथ खाना मत खाइए लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया। मैंने उन्हें गलत सलाह नहीं दी। मैंने खुद सोलापूर में एक बोर्डिंग खोला है। महार जाति के अलावा अन्य किसी जाति की उसमें मदद नहीं है। फिर भी उसमें सभी अस्पृश्य जाति के बच्चों को लिया जाता था। मांग, चमार, महार, ढोर और बच्चे भी थे। लंबे समय तक सभी बच्चे एक ही पंगत में बैठ कर एक ही रसोइए के हाथ का बना खाना खाया करते थे। लेकिन कुछ समय के बाद चमार और ढोर बच्चों ने विवाद खड़ा किया और चमार रसोइए की मांग करने लगे। तब मैंने कहा कि सबसे कनिष्ठ जाति है भंगी की। हम उन्हीं में से किसी को रसोइया नियुक्त करते हैं, फिर किसी को किसी तरह की शिकायत ही नहीं होगी। इसके लिए महारों के बच्चे तैयार हुए लेकिन और बच्चे तैयार नहीं हो रहे थे। और वह बोर्डिंग बंद कर दिया गया। लेकिन हमने अपने सिद्धांतों के साथ समझौता नहीं किया। जिन ब्राह्मणों या मराठा लोगों के कारण आप इस तरह का बर्ताव करते हैं, क्या वे इस तरह पेश आ सकते हैं? वे अगर इस प्रकार का आश्वासन आपको दे रहे हों तो आप बेशक उनके साथ चले जाइए। हमें उससे कोई मतलब नहीं है। मैं आपसे सिर्फ यही कहना चाहता हूं कि महार जाति ब्राह्मण या मराठा जाति से कई गुना सुधरी हुई जाति है। वे जातिभेद नहीं मानते। सभी समदुखी लोगों की मदद करने के लिए वे तैयार हैं। आप अगर उनके साथ सहयोग करना चाहें तो उन्होंने सभी राहें खोल कर रखी हैं। आप हमसे आकर मिलें। महारों की ताकत/सामर्थ्य का तथा उनके संगठन का फायदा आपको मिलेगा। अस्पृश्यों को जो राजनीतिक अधिकार मिले हैं, उन्हें पाने के लिए किसने कोशिश की? उन्हें पाने के लिए आप मांग लोगों ने या चमारों ने क्या कोशिशें की हैं? निडर होकर आज मैं आपसे यह कहना चाहता हूं कि इन राजनीतिक हकों को पाने के लिए अगर किसी ने स्वार्थत्याग किया हो तो वह है महार जाति। लेकिन इसका फायदा आप सब लोगों को मिला हुआ है। नासिक पुलिस ट्रेनिंग स्कूल में आज अस्पृश्यों को अगर प्रवेश मिला है तो वह किसकी कोशिशों के कारण मिला है? इस ट्रेनिंग स्कूल की शुरुआत से लेकर अब तक उसमें किसी अस्पृश्य जाति का प्रवेश संभव नहीं हुआ था। इतना ही नहीं, सरकार ने वहां एक प्रतिबंध लगा रखा था कि हलके दर्जे की जातियों के लोगों को उस ट्रेनिंग सेंटर में प्रवेश न दिया जाए। उस निर्बंध को हटाने के लिए किसी भी मांग या चमार नेता ने कोई कोशिश नहीं की। मैंने उनके लिए कोशिश की है और