92. धर्म परिवर्तन से अस्पृश्यों को समानता का अधिकार प्राप्त होगा - जून 1936 मुंबई - Page 543

526 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

कि, ऐसा नहीं कि केवल मुंबई इलाके के अस्पृश्य वतनदारों को मताधिकार दिया गया हो, यह अधिकार पूरे भारत के अस्पृश्य वतनदारों को दिया गया है। मद्रास, यूपी आदि कई प्रांतों से जिन अस्पृश्य जातियों के पास वतनदारी है, उन जातियों को यह लाभ मिला है। सिर्फ मुंबई में इसे लागू किया गया है, कहना सफेद झूठ है। इससे आगे बढ़ कर मैं यह सवाल पूछता हूं कि क्या मुंबई इलाके में यह अधिकार केवल महारों को मिला है? ध्यान रखें, यह अधिकार महारों को नहीं मिला है, यह अधिकार मिला है वतनदारों को। कन्नड इलाके में महार वतनदार नहीं हैं, मांगों के पास वहां वतनदारी है। अर्थात, उस इलाके में वतनदारी का फायदा किसे मिलने वाला है? मांगों को या कि महारों को? इस तरीके से आप अगर सोचेंगे तो आपको साफ-साफ पता चलेगा कि जिन लोगों ने यह हल्ला मचा रखा है, वे या तो अज्ञानी हैं या पाजी हैं। ऐसे लोगों की हरकतों से आपको सावधान रहना होगा। यह इशारा आपको देने की आवश्यकता मुझे महसूस हो रही है।

महार समाज का राजनीतिक कद, वर्चस्व, वैभव में बढ़ोतरी हो और अन्य लोगों का कम किया जाए, इस तरह की मेरी यदि सोच होती तो कल जो मैंने महार जाति के सम्मेलन में जिस तरह का भाषण दिया है, वह किया नहीं होता। कल की महार समाज की सभा में मैंने स्पष्टता से कहा है कि आगामी नए विधिमंडल में जो पन्द्रह सीटें अस्पृश्यों को प्राप्त हुई हैं, उन सीटों में से कुछ जगह मांग जाति को दी जानी चाहिएं।

ब्राह्मणेतर पिछड़ी जातियों में भी अस्पृश्य जातियों की भांति छोटे-छोटे गुट हैं। ब्राह्मणेतर पिछड़ी जातियों को भी अस्पृश्य जाति के समान कुल सात आरक्षित सीटें प्राप्त हुई हैं। किन्तु इन सात सीटों में से एक भी सीट अति पिछड़े समाज के प्रतिनिधि को दिए जाने की बात और आश्वासन एक भी मराठा जाति के नेता नहीं दे रहे हैं। किन्तु मैं तुम्हें आश्वस्त करता हूं कि आपकी जाति के योग्य उम्मीदवार को सीट देने का आश्वासन कृति में उतारने का भरपूर प्रयास मेरी ओर से किया जाएगा। मराठा समाज में उदारता अपेक्षा होने पर भी वे उसे पूरा नहीं कर पा रहे हैं, किन्तु महार समाज उदारता का सबूत दिखा देगा। यह बात सीधी है या सरल है, ऐसा कोई कह नहीं पाएगा।

यह कार्य बेहद मुश्किल और कठिन है। कोई भी जाति क्यों ना हो, उसे स्वार्थ तो है ही और यह स्वार्थ, लालसा परे रखकर उसे जो मिला है, या मिलने वाला है, उस मेंं से दूसरों को अपने लाभ में से हिस्सा दे देना व्यावहारिक दृष्टिकोण से कोई मामूली या छोटी बात नहीं है। अपने लाभ में कुछ हिस्सा देने की महार समाज की पूरी तैयारी है। केवल इतना ही पर्याप्त नहीं तो महार-मांग, इस तरह का जातिभेद