92. धर्म परिवर्तन से अस्पृश्यों को समानता का अधिकार प्राप्त होगा - जून 1936 मुंबई - Page 544

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खत्म कर एक जात करने की महार समाज की तैयारी है। यह बात महार लोगों के धर्म परिवर्तन करने के संकल्प से सिद्ध हो चुकी है और इसीलिए आप सभी उन लोगों के साथ धर्म परिवर्तन का दृढ़ निश्चय करें, यह बात वे आप लोगों से आग्रह पूर्वक अनुरोध करने से सिद्ध हो जाती है।

धर्म परिवर्तन करने के जो कुछ अनेक हेतु होंगे, उसमेंं अस्पृश्य समाज के आपस के जातिभेद नष्ट करना भी एक प्रमुख हेतु इसमें निहित है। सभी अस्पृश्य समाज द्वारा धर्म परिवर्तन किए बगैर अस्पृश्य जाति में स्थित जातिभेद खत्म हो पाना असंभव है। जातिभेद नष्ट किए बगैर जाति-द्वेष की भावना नष्ट होना मुश्किल है। धर्म परिवर्तन महार समाज का विशेष कल्याण करने हेतु किया जा रहा है, यह बात इसमें नहीं है। सभी अस्पृश्य जातियों को एक धागे में पिरोकर उन लोगों का आपसी भेदभाव

खत्म कर उन्हें ताकतवर और संगठित बनाना, यही धर्म परिवर्तन का मुख्य हेतु है। धर्म परिवर्तन एक तरह से अमृत है। उस अमृत से हम शुद्ध होंगे, ऐसा हमारा दृढ़ विश्वास है। किन्तु, केवल हम ही निर्मल बनें, यही सीमित उद्देश्य हमारा ना होकर मांग, चमार आदि सभी जातियां धर्म परिवर्तन का अमृत पीकर वे शुद्ध, निर्मल बनें, ऐसी हमारी अभिलाषा है। यह धर्म परिवर्तन का अमृत सभी के लिए है।

संत तुकाराम महाराज ने अपने दोहे, अभंगों में कहा है कि,

”सेवन कर रस देता हूं सभी को,

ले लो, मत बिखरो

मत भागो, जंगल-मैदान।“

संत तुकाराम के संदेश का मर्म समझिए।

धर्म परिवर्तन करने से तुम्हें महार जाति से रोटी-बेटी व्यवहार का, समानता का अधिकार प्राप्त होगा, और समानता का हक देने के लिए महार समाज तैयार है। इतना अधिक बड़प्पन और उदारता अन्य दूसरा कौन-सा समाज दिखा पाएगा? विधिमंडल की जगहों से भी बढ़कर यह भेंट क्या अनमोल नहीं है? इस उदारता से बढ़कर और क्या चीज हो सकती है? और आपको इस चीज की कीमत, कद्र ना हो तो, आप अपनी राह चलने के लिए आजाद हो। जिस राह से आपको गुजरना हो, उस रास्ते से आप बेशक चलें। हम अपनी मुक्ति, अपना उद्धार स्वयं कर लेंगे, और इस ध्येय को हासिल करने के लिए, हमें यदि अपना सिर कलम करना पड़ा, तब भी हम पीछे नहीं हटेंगे। मांग-चमारों की ताकत की हमें कोई जरूरत नहीं, यही समझ लीजिए। किन्तु हम इस तरह का रूखा व्यवहार नहीं करना चाहते। महार समाज को जाति दंभ, अभिमान या पोषण नहीं करना है अथवा जाति को बढ़ावा देने का विचार