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बहनों, समाज पर बट्टा लगाने वाले धंधे से मुक्त हो जाओ
दिनांक 30 मई से 1 जून, 1936 को मुंबई इलाका महार परिषद में पारित हुए धर्म परिवर्तन प्रस्ताव का पहला आघात कामाठीपुरा में रहने वाले मुरल्या, जोगतिण् ा, देवदासी आदि समाज से त्याग दिए गए वर्ग पर हुआ। ज्यादातर इस वर्ग की सभी महिलाएं सदाचार के साथ उदरनिर्वाह न कर पाने के कारण इस अनीतिकारक व्यवसाय में आई हैं। महार परिषद के बाद ये महिलाएं अपने बारे में सोचने लगीं। उन्होंने स्वयं स्फूर्ति से एक निजी बैठक बुलाई। बैठक में यह तय किया गया कि अपने व्यवसाय की महिलाओं और पुरुषों की एक सभा बुलाई जाए। उस सभा में डॉ. बाबासाहेब को आमंत्रित कर उनके मुख से अपनी मुक्ति के बारे में उपदेश की चार बातें सुनी जाएं। उस हिसाब से भगवानों को समर्पित सभी वर्गों की (जिनमें वाघे, पोतराज, भूते और महिलाएं आदि शामिल थे) एक सभा 16 जून, 1936 की रात को पोयबावडी के नजदीक के दामोदर हॉल में आयोजित की गई थी। इस सभा में महिलाएं और पुरुष मिल कर लोगों का बड़ा समुदाय इकट्ठा हुआ था। लोगों की भीड़ के कारण दामोदर हॉल खचाखच भरा था। शुरुआत में कुछ देवदासी, मुरल्या, पोतराज और वाघ्याओं के भाषण हुए। इस व्यवसाय से पीछे हटने की उन्होंने अपने भाई-बहनों से विनती की। कुछ वक्ताओं ने खुले आम बताया कि वे इस व्यवसाय से पहले ही निकल चुके हैं और ईमानदारी से पसीना बहाकर मेहनत की कमाई से अपना पेट पालते हैं, इसीलिए हमारा जीवन स्वाभिमानपूर्ण हुआ है।
बाद में डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर तालियों की गड़गड़ाहट के बीच बोलने के लिए उठ कर खड़े हुए। उस रात उनके चेहरे पर परेशानी के चिह्न उभरे थे। उन्होंने बोलने की शुरूआत की तो सभागृह में एकदम शांति और गंभीरता छाई। डॉ. अम्बेडकर ने अपने भाषण में कहा,
”आज की सभा मुझे हाल ही में हुई महार परिषद की सभा से सौ गुना अधिक महत्त्वपूर्ण लगती है। समाज का जो हिस्सा अत्यंत हीन अथवा बेकार माना जाता है, उसके आप सदस्य हैं। यही आपका समाज है। धर्म के नाम पर अनैतिक ढंग से अपना पेट पालने वाली महिलाएं हैं आप। जिनका स्वाभिमान नष्ट हुआ है, देह की बिक्री कर शरीर को पालना ही जिनके जीवन का अंग बन चुका है, उस वर्ग द्वारा दुनिया में क्या चल रहा है समझने की जिज्ञासा दिखाना, अपना चरित्र सुधारने की मंशा व्यक्त करना सचमुच बहुत ही गर्व करने लायक है। इसीलिए महार परिषद में
* 4 जुलाई, 1936