93. बहनों, समाज पर बट्टा लगाने वाले धंधे से मुक्त हो जाओ - जून 1936 कामाठीपुरा (मुंबई) - Page 547

530 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

25000 लोग इकट्ठा हुए इसका मुझे उतना महत्त्व नहीं लगता, जितना आज की इस सभा में आप 400-500 लोग इकट्ठा हुए हैं उसका लगता है। आज की इस सभा के लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं।

इस भूमिका के बाद मैं मुख्य विषय की तरफ मुड़ता हूं। आज मुंबई शहर में महार समाज को अगर शर्म से गर्दन कहीं झुकानी पड़ती है तो वह आपके कामाठीपुरा आते समय। अपनी बहनें वहां किस तरह के नरक से गुजर रही हैं, अन्य समाज से

खुद को किस तरह भ्रष्ट करवा रही हैं इसकी तस्वीर आंखों के सामने खडे़ होते ही हर महार को विषाद घेर लेता है। आज आपने महार समाज के साथ धर्म परिवर्तन करने की इच्छा जाहिर की है, आपके इस निश्चय के कारण मुझे यह सोच कर

खुशी नहीं हो रही कि मेरे अनुयायियों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है या मेरी धर्म परिवर्तन की घोषणा को मिल रहे समर्थन से मुझे संतोष नहीं हो रहा है। हमारे धर्म परिवर्तन का अर्थ अच्छी तरह समझ लीजिए। हम धर्म परिवर्तन कर रहे हैं इस दुर्गंध भरे वातावरण से बाहर निकलने के लिए। सबको समता का, बंधुत्व का, स्वाभिमान का आदर्श जीवन प्राप्त हो और हरेक का जीवन उज्ज्वल हो, इस दृष्टि के साथ हम धर्म परिवर्तन के लिए तैयार हो गए हैं। आप अगर हमारे साथ आना चाहते हैं, अपने जाति बंधुओं के साथ धर्मांतरण करना चाहते हैं तो पहले आपको अपना यह दुर्गंध से भरा जीवनक्रम छोड़ देना होगा। अपने मलिन तरीकों का आपको त्याग करना होगा। यह यदि आप करने के लिए तैयार हों, तभी आप हमारे साथ आएं। वरना आप हमारे साथ ना आएं। मर्जी हो तो आप जहां हैं, वहीं रहें। मुसलमान या ईसाई बनें। हमें उसमें कोई आपिŸा नहीं होगी। लेकिन अगर हमारे साथ आप आना चाहें तो आपको काया, वाचा, मन की शुद्धता कर इस त्रिशुद्धि से शुचिर्भूत होकर ही आपको हमारे साथ आना होगा। वरना मैं आपको साफ-साफ बताता हूं कि आप हमारे साथ नहीं आ सकेंगे।

अगर आप अपना पुराना जीवनक्रम उसी तरह चलाते हुए महार जाति को बट्टा लगाने का काम जारी रखने वाली हों, अपना काम उसी तरह करने वाली हों तो मैं आपको चेतावनी देता हूं कि हजारों युवा स्वयंसेवकों को तैयार कर मैं कामाठीपुरा से आपको हमेशा के लिए हटवा दूंगा।

महिला समाज का अलंकार हैं यह आपको जानना होगा। हर समाज महिलाओं के चरित्र का बहुत अधिक सम्मान करता है। हर किसी की यह उम्मीद होती है कि अपनी गृहस्वामिनी बनने वाली महिला उŸाम कुल की हो। वैसी ही भार्या पाने की हर एक की कोशिश रहती है। क्योंकि वह जानता है कि अपना, अपने बच्चों का, अपने परिवार का और कुल का नाम महिला के चरित्र पर निर्भर करता है।