93. बहनों, समाज पर बट्टा लगाने वाले धंधे से मुक्त हो जाओ - जून 1936 कामाठीपुरा (मुंबई) - Page 548

531

महिलाओं को इतना बड़प्पन मिला हुआ है। लेकिन कामाठीपुरा का जीवनक्रम देखें तो वह स्त्री जीवन को कलंक लगाने वाला है। इसीलिए, आप महिलाओं को समाज में क्या स्थान प्राप्त है, यह जान कर अपने बुरे जीवनक्रम का त्याग करना चाहिए, अपना खुद का तथा अपनी जाति का दर्जा और नाम ऊंचा करना चाहिए। आप शायद सवाल पूछेंगे कि यह धंधा ही हमारे उदरनिर्वाह का साधन है। इतना ही नहीं, इसी धंधे के कारण आज हमें किसी चीज की कमी नहीं है। हमारी जिंदगी बड़े सुख के साथ बसर हो रही है। हमारे पास नौकर-चाकर हैं। इस तरह की आराम की जिंदगी छोड़ कर हम क्या करें? मैं आपसे जब यह शर्मनाक जीवन त्यागने के लिए कह रहा हूं, तभी एक और बात साफ कर दूं कि आपको उदरनिर्वाह के साधन उपलब्ध कराना मेरा काम नहीं है, न मैं इसकी जिम्मेदारी ले रहा हूं। आज हजारों महिलाएं गरीब पति के साथ शादी करके उनके साथ दरिद्रता में दिन बिता रही हैं। पेट पालने के लिए उन्हें परिश्रम करना पड़ता है, तरह-तरह के कष्ट उठाने पड़ते हैं। हजारों महिलाएं मिलों में काम करती हैं, कारखानों में काम करती हैं, और गृहस्थी के अन्य दुख झेलते हुए अपने बच्चों के साथ गरीबी में, भूखे पेट रह कर

खुशी-खुशी दिन बिताती हैं। आपके धंधे में सुख मिलता है, इसलिए वे इस धंधे में नहीं आतीं। क्यों नहीं आतीं वे आपके धंधे में? क्यों वे इतने कष्ट सहती हैं? इस पर आप सोचें। महाभारत की कथाएं आपने सुनी हैं। जिस समय पांडव जुए में हार गए तब वल्कल और मृगचर्म धारण कर वनवास जाने के लिए निकले। उनके साथ वैसे ही वस्त्र धारण कर द्रौपदी भी गई थी। रास्ते में कौरवों में से दुर्योधन ने उससे कहा, ‘द्रौपदी, इन मूर्ख पतियों का साथ देकर तुम अपना जीवन क्यों दुख में डाल रही हो? अपनी सुकुमार देह को कष्ट क्यों दे रही हो? तुम मेरे साथ रहो। मैं तुम्हें पूरे ऐशोआराम के साथ रखूंगा। तुम्हें कोई भी दुख नहीं होगा। उस समय साध्वी और मानिनी द्रौपदी ने दुर्योधन को जो जवाब दिया था वह आपको याद रखना होगा। उसने कहा था, ‘ऐश्वर्य पाकर अगर मैं नीति के साथ जीवन न बिता सकूं तो मुझे ऐश्वर्य नहीं चाहिए। राजमहल से मुझे कष्टकर वनवास अधिक प्रिय है।’ आपको भी ऐसे ही विचार अपने मन में रखने होंगे। कष्ट करने से आप डरें क्यों? अपनी हजारों बहनों की तरह अपने-अपने गांव जाकर या फिर यहां नौकरी कर आप कष्ट कर अपनी उपजीविका कमाना आपको इतना कष्टमय क्यों लगता है? आपको अपनी जाति के बारे में गर्व क्यों नहीं महसूस होता? खुद को भ्रष्ट करने वाला और अपनी जाति को कलंकित करने वाला जीवन आप क्यों नहीं छोड़ देतीं? आपके इस लांछनापूर्ण धंधे की वजह से पूरे महार समाज को कितनी शर्म में डुबो दिया है, इसके बारे में तुम्हें अहसास नहीं है। हमें हर घड़ी आपके कारण अपमान से गर्दन झुकानी पड़ती है। कुछ साल पहले मैं कामाठीपुरा में एक सभा में गया था। उस वक्त मेरे मित्र डॉ. सोलंकी भी साथ थे। शिक्षा के बारे में भाषण करते समय मैंने कहा था कि