93. बहनों, समाज पर बट्टा लगाने वाले धंधे से मुक्त हो जाओ - जून 1936 कामाठीपुरा (मुंबई) - Page 549

532 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

सरकार शिक्षा के बारे में मुसलमानों को जो सुविधाएं देती है, वे अस्पृश्य समाज को नहीं देती, यह बात बिल्कुल सच है। उस वक्त वहां कुछ मुसलमान लोग उपस्थित थे। उनमें से एक ने बताया कि, महारों को मुसलमानों के बारे में ईर्ष्या क्यों महसूस हो? हम दो-दो, चार-चार ‘महारणियों’ को रखते हैं। उनकी इस चुभती टिप्पणी का मैंने कोई जवाब नहीं दिया, लेकिन उनके इस वाक्य से मुझे कितनी पीड़ा पहुंची होगी, कितना बुरा लगा होगा इसके बारे में आप ही सोचिए। मुझे आपके जीने के इस तरीके के बारे में, कामाठीपुरा में आपके रहने के बारे में सोच कर बेहद गुस्सा आता है, मैं बिल्कुल तिलमिला जाता हूं गुस्से से।

इसीलिए मैं एक बार फिर आपको ठोंक-बजा कर बता रहा हूं कि अगर आप महार कहलाना चाहते हैं, तो आपको यह गलीज धंधा छोड़ना ही होगा। आपको इस धंधे में ही रहने देकर मैं अपने साथ आने नहीं दे सकता। इतना कह कर भी अगर आप नहीं सुनेंगे तो मैं आपको यहां से भगा देने से पीछे नहीं हटूंगा। इसीलिए आप तुरंत जाग जाएं और इस हीन चरित्रक्रम का त्याग करें।

मुझे बताया गया है कि आज की सभा आपने खुद होकर बुलाई है। अपने में सुधार लाने के लिए आप प्रेरित हो गई हैं। इसलिए, मेरी आशा जल्द ही सफल होगी, इस अभिलाषा के साथ मैं अपना भाषण पूरा करता हूं।“

डॉ. बाबासाहेब का भाषण जब चल रहा था तब उन महिलाओं के हृदय गद्गद् हो आए थे। क्योंकि भाषण एकदम स्फूर्तिदायक हुआ था। सभा के अन्य कामकाज निपटने के बाद सभा बर्खास्त हुई।